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Bhairava Ravivara Vrat | Bhairava Vrat

DeepakDeepak

Bhairava Ravivara Vrat

Bhairava Ravivara Vrat

भैरव रविवार व्रत भगवान कालभैरव को समर्पित एक अत्यन्त प्रभावशाली व्रत है। यह व्रत रविवार को किया जाता है। हिन्दु धर्म में रविवार का दिन भगवान भैरव को समर्पित होता है। नवग्रहों के आधार पर यह दिन सूर्यदेव द्वारा शासित होता है। धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार भैरव, भगवान शिव के ही रुद्रावतार हैं। भैरव देवता को न्याय, सुरक्षा, शत्रु नाश, तन्त्र बाधा निवारण तथा निर्भयता के देवता के रूप में वर्णित किया गया है। भैरव देव के पूजन से व्यक्ति के अन्तर्मन में व्याप्त समस्त ज्ञात-अज्ञात भय समाप्त हो जाते हैं। कालभैरव, वटुक भैरव, कपाल भैरव आदि भगवान भैरव के आठ भिन्न-भिन्न रूप हैं, जिन्हें संयुक्त रूप से अष्टभैरव कहा जाता है।

Kali Puja
Lord Kalabhairava

भैरव रविवार व्रत विशेषतः उन सभी के लिये लाभकारी सिद्ध होता है जो शत्रु भय, अदृश्य बाधा या असाध्य रोगों से पीड़ित हों तथा जो राहु, केतु एवं शनि जनित ग्रहदोष से मुक्ति प्राप्त करना चाहते हों। तन्त्र-मन्त्र एवं नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा हेतु भी इस व्रत का सुझाव दिया जाता है। भगवान कालभैरव के भक्त जीवन में शक्ति, साहस एवं सुरक्षा की प्राप्ति हेतु यह व्रत अत्यन्त श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक करते हैं।

भैरव रविवार व्रत आहार विचार

व्रत के समय शरीर एवं मन दोनों की निर्मलता हेतु भैरव रविवार व्रत में आहार सम्बन्धी कुछ विशिष्ट नियमों का पालन किया जाता है। व्रत के पूर्व शनिवार रात्रि से ही मद्यपान, धूम्रपान, मांसाहार, लहसुन, प्याज आदि तामसिक भोजन त्याग देना चाहिये तथा सुपाच्य एवं सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिये। व्रत के दिन सम्पूर्ण दिवस व्रती को पूर्णतः उपवास का पालन करना चाहिये, अथवा कुल-परम्परा एवं आचार्य-मत के अनुसार फलाहार ग्रहण करना उचित होता है।

फलाहार में मात्र फल, दुग्ध, जल, मखाना, मूंगफली, साबूदाना आदि शुद्ध सात्विक आहार का ही सेवन करना उत्तम माना गया है। एकभुक्त अर्थात् एक समय भोजन करने वाले व्रतधारी को सूर्यास्त के उपरान्त ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिये। भैरव रविवार व्रत में अधिक एवं मिथ्या भाषण, काम, क्रोध, अपवित्रता आदि दुर्गुण निषिद्ध माने जाते हैं।

भैरव रविवार व्रत सङ्क्षिप्त विधि

सर्वप्रथम प्रातः किसी नदी आदि पवित्र जल स्रोत में, अथवा जल में गङ्गाजल मिलाकर स्नान करें तथा शुद्ध वस्त्र धारण करें। नित्य कर्मों से निवृत्त होने के उपरान्त, व्रत एवं पूजा के माह, पक्ष, तिथि आदि का उच्चारण करके निम्नोक्त सङ्कल्प लेना चाहिये - "मैं शत्रु भय, अदृश्य बाधा, असाध्य रोगों के निवारण, समस्त कामनाओं की पूर्ति तथा भगवान भैरव की प्रसन्नता हेतु रविवार व्रत एवं भैरव पूजन करूँगा।"

  • सङ्कल्प ग्रहण करने के पश्चात्, पूजन-स्थल पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • एक लकड़ी की चौकी पर काला वस्त्र बिछाकर भगवान भैरव की प्रतिमा अथवा चित्रपट स्थापित करें।
  • तदुपरान्त गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदि सहित भैरव जी का पञ्चोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करें तथा उन्हें सरसों का तेल, काले तिल, काली उड़द, काला वस्त्र, लड्डू, नारियल एवं माला अर्पित करें।
  • यथा शक्ति ॐ कालभैरवाय नमः। मन्त्र का जाप करें।
  • तत्पश्चात् भैरव चालीसा, कालभैरव अष्टकम् अथवा भैरव कवच का पाठ करें।
  • व्रत का सम्पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु भैरव रविवार व्रत कथा का पाठ एवं श्रवण करें।
  • पूजनोपरान्त, काले कुत्ते को भोजन अवश्य अर्पित करें।

इस प्रकार भैरव रविवार व्रत की यह सरल विधि सम्पन्न होती है।

भैरव रविवार व्रत उद्यापन

क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार भैरव रविवार व्रत भिन्न-भिन्न संख्याओं में किया जाता है। सामान्यतः 21, 31, अथवा 51 रविवार तक नियमित रूप से व्रत करने के उपरान्त भैरव रविवार व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन की विधि में क्षेत्रीय एवं कुल परम्परा के आधार पर अन्तर हो सकता है।

उद्यापन हेतु किसी विद्वान आचार्य का वरण करें। आचार्य के निर्देशानुसार, भैरव रविवार व्रत के समापन का सङ्कल्प ग्रहण करें। भैरव अष्टक या भैरव स्तोत्र का पाठ करें। "ॐ कालभैरवाय नमः।" मन्त्र से 108 आहुतियों सहित हवन करें। हवन में आम की लकड़ी की समिध तथा तिल, तेल, उड़द एवं काली सरसों की आहुतियाँ होनी चाहिये। पूर्णाहुति के पश्चात् सम्पूर्ण पूजन सामग्री आचार्य को दान कर दें तथा ब्राह्मणों को काले वस्त्र, तिल, तेल, उड़द, आदि दक्षिणा सहित अर्पित करें।

सभी आचार्य एवं ब्राह्मणों को भोजन करायें। भोजन में उड़द एवं तिल निर्मित व्यञ्जन तथा बाजरे की खिचड़ी भी सम्मिलित करें। पूजन सम्पन्न होने पर आचार्य एवं अन्य अतिथियों को सम्मानपूर्वक विदा करें और स्वयं भी बन्धु-बान्धवों सहित भोजन ग्रहण करें। भैरव रविवार व्रत में किसी काले कुत्ते को भोजन करवाना भी अनिवार्य माना गया है। इस प्रकार भैरव रविवार व्रत की सरल उद्यापन विधि सम्पन्न होती है।


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