इन्द्राणी मातृका, हिन्दु धर्म में पूजी जाने वाली सप्त मातृकाओं में से एक हैं। इन्द्राणी को ऐन्द्री, वज्री, महेन्द्री, पुलोमजा एवं पौलोमी के नाम से भी जाना जाता है। इन्द्राणी, देवराज इन्द्र की शक्ति हैं। उनका स्वरूप एवं वेशभूषा भी देवराज इन्द्र के ही समान है। इन्द्राणी, इन्द्रलोक में निवास करती हैं। देवी की पूजा करने से समस्त शत्रुओं का शमन होता है।
वराहपुराण के अनुसार, प्रत्येक मातृका एक भावना से सम्बन्धित हैं, जिसमें इन्द्राणी को ईर्ष्या की भावना का प्रतिनिधित्व करते हुये वर्णित किया गया है। देवी इन्द्राणी की आराधना करने से सुखी दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

देवी माहात्म्य के अनुसार, शुम्भ नामक दैत्य ने भीषण दैत्यों की सेना लेकर देवी चण्डिका पर आक्रमण कर दिया। ज्यों ही असुरों की सेना ने देवी को घेरा, उसी समय भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवराज इन्द्र तथा कार्तिकेय आदि देवताओं की देह से भिन्न-भिन्न शक्तियाँ दैत्यों का संहार करने हेतु उत्पन्न हो गयीं। ब्रह्मा से ब्राह्मणी, विष्णु से वैष्णवी तथा शिव से माहेश्वरी मातृका का प्रादुर्भाव हुआ। उसी क्रम में देवराज इन्द्र के शरीर से इन्द्राणी नामक मातृका प्रकट हुयीं। देवी चण्डिका की सहायता हेतु इन्द्राणी रणभूमि में गज पर आरूढ़ होकर उपस्थित हुयी थीं तथा भीषण संग्राम में दैत्यों को पराजित किया था।
देवी इन्द्राणी को श्याम वर्ण स्वरूप में गज पर आरूढ़ दर्शाया जाता है। वे लाल रँग के सुन्दर वस्त्र धारण करती हैं। देवी को चतुर्भुज रूप में वर्णित किया गया है। दो भुजाओं मे वे वज्र एवं अङ्कुश धारण करती हैं तथा शेष दो भुजायें वरद मुद्रा एवं अभय मुद्रा में स्थित हैं।
मूल मन्त्र -
ॐ ऐन्द्री नमः।
ॐ इन्द्रान्ये नमः।