भगवान गणेश साक्षात परमब्रह्म हैं। उन्हें श्रीविष्णु, श्रीशिव, शक्ति और ब्रह्मा से अभिन्न नहीं माना जाता है। किन्तु कार्य और लीला की दृष्टि से परात्पर निर्गुण निराकार ब्रह्म ही भिन्न-भिन्न गुणों से भिन्न-भिन्न आकारों में स्वयं को अभिव्यक्त करता है। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। सभी देवताओं में प्रथम पूजन के अधिकारी मात्र गणपति जी ही हैं। गणेश जी के विभिन्न कालों और ब्रह्माण्डों में अनन्त अवतार हुये हैं, जिनका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है, किन्तु भगवान गणेश के प्रमुख 8 अवतार ब्रह्मधारक माने जाते हैं। जिन्हें संक्षेप में अष्ट विनायक कहा जाता है। इन अवतारों का अध्यात्म क्षेत्र में बहुत बड़ा महत्त्व माना गया है। ये सभी अवतार भिन्न-भिन्न रूप में ब्रह्म के गुणों को अभिव्यक्त करते हैं। भगवान गणेश के इन सभी अवतारों ने, विभिन्न विकारों के स्वरूप में उपस्थित असुरों का उन्मूलन, अर्थात अन्त किया। मुद्गल पुराण में इन अवतारों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।