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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग - द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में तीसरे ज्योतिर्लिङ्ग

DeepakDeepak

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग

भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में से तृतीय ज्योतिर्लिङ्ग, श्री महाकालेश्वर के रूप में विश्व विख्यात हैं। यह अभूतपूर्व ज्योतिर्लिङ्ग, मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तटपर उज्जैन नामक नगर में विद्यमान है। हिन्दु धर्म में उज्जैन नगर का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है तथा प्राचीन धर्म ग्रन्थों में इसे अवन्तिकापुरी के नाम से वर्णित किया गया है।

Mahakaleshwar Temple

शिवमहापुराण की कोटिरुद्रसंहिता में वर्णित माहात्म्य के अनुसार, भगवान शिव के श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग स्वरूप की नियमित पूजा-आराधना करने से मनुष्य समस्त मनोरथ सिद्ध कर, अन्त में मोक्ष प्राप्त करता है। श्री महाकालेश्वर मन्दिर में एक लघु जलस्रोत है, जो कोटितीर्थ कहलाता है। महाकालेश्वर काल के देवता हैं। काल का अर्थ समय एवं मृत्यु दोनों ही होता है, अतः महाकाल जी को समय एवं मृत्यु पर शासन करने वाले देव के रूप में पूजा जाता है। सम्पूर्ण द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में से श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंङ्ग को दक्षिणामूर्ति माना जाता है। अतः इस रूप में भगवान शिव का मुख दक्षिण दिशा की ओर है, जिसका तन्त्र मार्ग के साधकों के लिये विशेष महत्त्व होता है।

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग प्राकट्य कथा

प्राचीन काल में अवन्तिका पूरी के नाम से एक अत्यन्त पुण्यदायी नगरी थी। उस दिव्य नगरी में एक अत्यन्त धर्मपरायण एवं उत्तम गुणों से युक्त ब्राह्मण निवास करते थे, जिनका नाम वेदप्रिय था। वह सदैव वेदाध्ययन एवं वैदिक अनुष्ठानों में लीन रहते थे। वह नित्य प्रतिदिन घर में पार्थिव शिवलिङ्ग का निर्माण कर, उनकी पूजा-आराधना करते थे तथा नियमित रूप से पूर्ण विधि-विधान का पालन करते हुये अग्निहोत्र यज्ञ का आयोजन करते थे।

वेदप्रिय ब्राह्मण देव के धर्माचरण एवं वेद परायणता के फलस्वरूप उन्हें अन्त में महान ऋषि, मुनि एवं तपस्वियों के तुल्य उत्तम सद्गति की प्राप्ति हुयी। वेदप्रिय जी के, देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत एवं सुव्रत नामक चार सुपुत्र थे। वह चारों पुत्र भी अपने महान पिता के समान सर्वश्रेष्ठ सद्गुणों से युक्त एवं धर्ममार्गी थे। उन चारों के पुण्य प्रताप से सम्पूर्ण अवन्ति-नगरी में एक दिव्य ब्रह्म तेज प्रकाशित हो रहा था।

वहीं दूसरी ओर, उसी अन्तराल में दूषण नामक एक असुर ने रत्नमाल पर्वत पर भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की तथा उनसे वरदान प्राप्त कर अति बलशाली हो गया। वह अधर्मी दुष्ट अपने बल के मद्य में लीन होकर वेदों, धर्मस्थलों एवं धर्मताओं पर आक्रमण करने लगा। अवन्ति नगरी में प्रकाशित धर्म के प्रकाश को देखकर, दूषण ने अवन्ति नगरी के ब्राह्मणों पर भी आक्रमण कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण नगर में हाहाकार होने लगा। दूषण द्वारा प्रेषित चार प्रलयाग्नि के समान दानवों ने सम्पूर्ण नगर को चारों दिशाओं से घेर लिया, किन्तु भगवान शिव की आराधना करने वाले वह चारों ब्राह्मण पुत्रों के मन में किञ्चित मात्र भी भय उत्पन्न नहीं हुआ। उन ब्राह्मण पुत्रों ने अन्य नगरवासियों को भी भयमुक्त रहने का आश्वासन दिया तथा शिवलिङ्ग की पूजा-अर्चना कर, भगवान शिव के ध्यान में मग्न हो गये। ब्राह्मण भ्राताओं को इस प्रकार शिव-पूजन करते देख दूषण क्रोध-कम्पित हो उठा और दानवों को उन्हें मार डालने का आदेश दिया। वेदप्रिय के चारों पुत्र नेत्र बन्द किये हुये भगवान भोलेनाथ शिव के चिन्तन में तल्लीन थे।

दूषण के एक दानव द्वारा उन ब्राह्मणों का वध करने प्रयास करते ही, भीषण गर्जना के साथ उनके द्वारा पूजित शिवलिङ्ग के स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया तथा उसमें स्वयं भगवान शिव अति विकराल स्वरूप में प्रकट हो गये। महादेव के भयङ्कर रूप के दर्शन करके, वहाँ उपस्थित सभी आश्चर्यचकित थे। भगवान शिव ने घोर गर्जना करते हुये दूषण से कहा, अरे दुष्ट, पापी, खलकामी, तेरे ही जैसे दुष्टों का संहार करने हेतु मैं महाकाल स्वरूप में प्रकट हुआ हूँ। ऐसा कहते ही शिव जी ने अपनी भीषण हुँकार से ही दूषण सहित उसकी सम्पूर्ण सेना को भस्मीभूत कर दिया।

दूषण का अन्त होते ही समस्त लोकों में हर्षोल्लास का वातावरण छा गया। देवगण भगवान शिव के महाकाल स्वरूप के दर्शन कर आकाश से पुष्पवर्षा करने लगे। भगवान महाकाल ने चारों ब्राह्मण पुत्रों से वर माँगने को कहा, किन्तु उन्होंने अपने निज स्वार्थ हेतु कुछ न माँगकर सम्पूर्ण जगत के कल्याण हेतु प्रभु से सदा-सर्वदा के लिये उसी स्थान पर विराजमान रहने का भक्तिपूर्वक निवेदन किया।

वेदप्रिय के पुत्रों का आग्रह स्वीकार करके, भक्तों का कल्याण करने वाले भगवान शिव, जिस गड्ढे से प्रकट हुये थे उसी में सदैव के लिये श्री महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में स्थित हो गये, जिन्हें भूलोक पर महाकालेश्वर के रूप में पूजा जाता है। उस स्थान से सभी दिशाओं में एक-एक कोस की भूमि भगवान महाकाल का स्थल बन गयी। भगवान श्री महाकालेश्वर की कृपा से वेदप्रिय ब्राह्मण के चारों पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुयी।

सूत जी कहते हैं, ऋषिगणों! श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग के दर्शन मात्र से समस्त दुःख-सन्ताप नष्ट हो जाते हैं तथा पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा के साथ महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पूजा-आराधना करने के फलस्वरूप समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति सहित मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

॥इति श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग उत्पत्तिः कथा सम्पूर्णः॥

श्री महाकालेश्वर तीर्थ क्षेत्र के समीप अन्य प्रमुख देवालय

  1. देवी महाकाली मन्दिर
  2. कालभैरव मन्दिर
  3. सप्तऋषि मन्दिर
  4. वृद्धकालेश्वर मन्दिर
  5. बृहस्पतेश्वर मन्दिर
  6. देवी अवन्तिका मन्दिर
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द्रिक पञ्चाङ्ग और पण्डितजी लोगो drikpanchang.com के पञ्जीकृत ट्रेडमार्क हैं।
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