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Kartika Mahatmya Pancham Adhyay | Kartika Mahatmya Fifth Chapter

DeepakDeepak

Kartika Mahatmya Fifth Chapter

पाँचवाँ अध्याय

कार्तिक में तुलसी वृक्ष के आरोपण एवं पूजन आदि की महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - 'कार्तिक मास में जो विष्णुभक्त पुरुष प्रातःकाल स्नान करके पवित्र होकर कोमल तुलसीदल से भगवान दामोदर का पूजन करता है, उसे निश्चित ही मोक्ष प्राप्त होता है। भक्ति से रहित मनुष्य यदि सुवर्ण आदि से भगवान की पूजा करे तो भी वे उसकी पूजा ग्रहण नहीं करते। सभी वर्णों के लिये भक्ति सर्वाधिक उत्कृष्ट मानी गयी है। भक्तिहीन कर्म भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला नहीं होता। यदि तुलसी के आधे दल से भी नित्य भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा की जाय तो भी वे साक्षात् दर्शन देते हैं।

पूर्वकाल में भक्त विष्णुदास भक्तिपूर्वक तुलसी-पूजन के द्वारा सहज ही विष्णुधाम को प्रस्थान कर गया तथा राजा चोल उसकी तुलना में गौण हो गये। हे नारद! अब तुम तुलसी का माहात्म्य श्रवण करो। तुलसी पापों का नाश एवं पुण्य की वृद्धि करने वाली है। मनुष्य के द्वारा लगायी हुयी तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्र युगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। यदि कोई तुलसी संयुक्त जल में स्नान करता है तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के लोक में निवास कर हर्षित होता है।

महामुने! जो लगाने के लिये तुलसी का संग्रह करता है तथा तुलसी का वन तैयार करता है, वह इतना करने मात्र से पापमुक्त हो ब्रह्मभाव में स्थित होता है। जिसके घर में तुलसी का उद्यान होता है, उसका घर तीर्थ के समान होता है तथा वहाँ यमदूतों का प्रवेश नहीं होता है। तुलसीवन समस्त पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यमय तथा अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति करने वाला है। जो श्रेष्ठ मनुष्य तुलसी की वाटिका लगाते हैं, उन्हें यम दर्शन नहीं होता। जो मनुष्य तुलसीकाष्ठ से युक्त गन्ध धारण करता है, क्रियमाण पाप उसकी देह का स्पर्श नहीं करता। जहाँ तुलसीवन की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध करना चाहिये। जिसके मुख में, कान में तथा मस्तक पर तुलसीदल दृष्टिगोचर होता है, उसपर यमराज भी दृष्टिपात नहीं कर सकते तो यमदूतों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक तुलसी की महिमा श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्रस्थान करता है।

पूर्वकाल का वृत्तान्त है, कश्मीर देश में हरिमेधा एवं सुमेधा नामक दो ब्राह्मण निवास करते थे। वे सदैव भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। उनके हृदय में समस्त प्राणियों के लिये दया का भाव था। वे सभी तत्वों के यथार्थ मर्म को ज्ञात करने वाले थे। कालान्तर में किसी समय उन दोनों ब्राह्मणों ने तीर्थयात्रा हेतु प्रस्थान किया। यात्रा करते-करते किसी दुर्गम वन में वे परिश्रम से व्याकुल हो गये। वहाँ उन्हें एक स्थान पर तुलसी का वन दृष्टिगोचर हुआ। उनमें से सुमेधा ने उस तुलसी के महान् वन का दर्शन कर उसकी प्रदक्षिणा की तथा श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। सुमेधा को ऐसा करते देख हरिमेधा ने तुलसी का माहात्म्य एवं फल ज्ञात करने हेतु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक बारम्बार निवेदन किया - 'ब्रह्मन्! अन्य देवताओं, तीर्थों, व्रतों एवं मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों के होते हुये तुमने तुलसीवन को क्यों प्रणाम किया है?'

सुमेधा ने कहा - 'हे महाभाग! सुनो! यहाँ धूप से कष्ट हो रहा है, अतः हम उस वटवृक्ष के समीप चलते हैं, उसकी छाया में बैठकर मैं यथार्थ रूप से विस्तृत वर्णन करूँगा।'

वहाँ विश्राम करके सुमेधा ने हरिमेधा से कहा - 'विप्रवर! पूर्वकाल में जिस समय ऋषि दुर्वासा के शाप से इन्द्र का ऐश्वर्य छिन गया था, उस समय ब्रह्मा आदि देवताओं एवं असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मन्थन किया था। उस समुद्रमन्थन से ऐरावत गज, कल्पवृक्ष, चन्द्रदेव, देवी लक्ष्मी, उच्चैःश्रवा अश्व, कौस्तुभ मणि तथा धन्वन्तरि स्वरूप में भगवान विष्णु एवं दिव्य औषधियों का प्राकट्य हुआ। तदुपरान्त अजरता एवं अमरता प्रदान करने वाले अमृत कलश को दोनों हाथों में लिये हुये श्रीविष्णु अत्यन्त हर्षित हुये। उनके नेत्रों से आनन्दाश्रु की कुछ बूँदें उस अमृत कलश के ऊपर टपकीं, उनसे तत्काल ही मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुयीं। इस प्रकार समुद्रमन्थन से प्रकट हुयीं देवी लक्ष्मी एवं तुलसी को ब्रह्मा आदि देवगणों ने श्रीहरि की सेवा में समर्पित किया तथा भगवान ने उन्हें स्वीकार कर लिया। उसी समय से तुलसी जी भगवान श्रीविष्णु की अत्यन्त प्रिय हो गयीं। समस्त देवतागण भगवत्प्रिया तुलसी की भगवान श्रीविष्णु के समान ही पूजा करते हैं। भगवान नारायण संसार के रक्षक हैं तथा तुलसी उनकी प्रियतमा है, एतावता मैंने उन्हें प्रणाम किया है।'

सुमेधा इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि सूर्यदेव के समान अत्यन्त तेजस्वी एक विशाल विमान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ। उन दोनों के सम्मुख ही वह वटवृक्ष गिर पड़ा तथा उससे दो दिव्य पुरुष प्रकट हुये जो सूर्य की भाँति सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उन दोनों दिव्य पुरुषों ने हरिमेधा एवं सुमेधा को प्रणाम किया। उनका दर्शन कर वे दोनों ब्राह्मण भयभीत हो गये तथा आश्चर्यचकित होकर बोले - 'आप दोनों कौन हैं? देवताओं के समान आपका सर्वमङ्गलमय स्वरूप है। आप नूतन मन्दार की माला धारण किये कोई देवता प्रतीत हो रहे हैं।' उन दोनों ब्राह्मणों के इस प्रकार प्रश्न करने पर वृक्ष से निकले पुरुष बोले - 'विप्रवरों! आप दोनों ही हमारे माता-पिता, गुरु एवं बन्धु आदि हैं।'

इतना कहकर उन पुरुषों में जो ज्येष्ठ था, वह बोला - 'मेरा नाम आस्तीक है, मैं देवलोक का निवासी हूँ। एक दिन मैं नन्दनवन में किसी पर्वत पर क्रीड़ा करने हेतु गया। वहाँ देवांगनाओं ने मेरे सङ्ग इच्छानुसार विहार किया। उस समय युवतियों के मोती एवं बेला के हार तपस्या करते हुये लोमश मुनि के ऊपर गिर गये। इससे मुनि अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने विचार किया कि - 'स्त्रियाँ तो परतन्त्र होती हैं, अतः यह उनका अपराध नहीं है। यह दुराचारी आस्तीक ही शाप के योग्य है।' ऐसा निश्चय कर उन्होंने मुझे शाप देते हुये कहा - 'अरे दुष्ट! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू ब्रह्मराक्षस होकर वटवृक्ष पर निवास करेगा।' तदुपरान्त मैंने विनयपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया तब उन्होंने इस शाप से मुक्त होने की अवधि भी निश्चित कर दी एवं कहा - 'जब तू किसी ब्राह्मण के मुख से भगवान विष्णु का नाम एवं तुलसीदल की महिमा का श्रवण करेगा तब तत्काल तुझे उत्तम मोक्ष प्राप्त होगा।' इस प्रकार मुनि का शाप प्राप्त कर मैं चिरकाल से अत्यन्त दुःखी हो इस वटवृक्ष पर निवास कर रहा था। आज दैववश आप दोनों के दर्शन से मुझे निश्चित ही शाप से मुक्ति प्राप्त हुयी है।

अब आप मेरे अन्य साथी की कथा श्रवण करें - ये पूर्वकाल में एक श्रेष्ठ मुनि थे तथा सदैव गुरु सेवा में लीन रहते थे। एक समय गुरुदेव की अवज्ञा करने के कारण ब्रह्मराक्षस भाव को प्राप्त हो गये, किन्तु आपके प्रसाद से इस समय उनकी भी ब्राह्मण के शाप से मुक्ति हो गयी। आप दोनों ने तीर्थयात्रा का फल तो यहीं अर्जित कर लिया है।'

ऐसा कहकर वे दोनों पुरुष उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बारम्बार प्रणाम करते हुये उनकी आज्ञा ग्रहण कर आनन्दपूर्वक दिव्य धाम को प्रस्थान कर गये। तदुपरान्त वे दोनों श्रेष्ठ मुनि परस्पर पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुये तीर्थयात्रा हेतु चल दिये। इसीलिये भगवान विष्णु को आनन्दित करने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी की पूजा अवश्य करनी चाहिये।'

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत
कार्तिक मास माहात्म्य का पञ्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


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