देवर्षि नारद कहते हैं - "हे राजन्! कंस ने विचार किया कि वसुदेवजी भयभीत होकर कहीं भाग न जायें, इसीलिये उसने अनेक सैनिक भेज दिये। कंस की आज्ञानुसार दस सहस्र शस्त्रधारी सैनिकों ने वसुदेवजी के भवन को घेर लिया। वसुदेवजी एवं देवकी के आठ पुत्र हुये जो क्रमशः एक वर्ष के समय अन्तराल पर होते गये। तदुपरान्त देवकी ने एक कन्या को भी जन्म दिया, जो साक्षात् भगवान की ही सनातनी माया थी। सर्वप्रथम जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम कीर्तिमान् था। वसुदेवजी उसे गोद में उठाकर कंस के समीप ले गये। वसुदेवजी को अपने वचन का पालन करते देख कंस को दया आ गयी। कंस ने कहा - 'वसुदेवजी! इस शिशु को लेकर आप लौट जायें, इससे मुझे कोई भय नहीं है। परन्तु आप दोनों का जो आठवाँ गर्भ होगा, उसका वध मैं अवश्य करूँगा इसमें कोई सन्देह नहीं है।"
श्रीनारदजी कहते हैं - "राजन्! कंस के ऐसा कहने पर वसुदेवजी अपने पुत्र सहित घर लौट आये, किन्तु उस दुरात्मा के वचन को उन्होंने तनिक भी सत्य नहीं माना। उस समय आकाश से उतरकर मैं कंस के समीप गया। उग्रसेन पुत्र कंस ने नतमस्तक होकर मेरा स्वागत-सत्कार किया तथा मुझसे देवताओं का प्रयोजन पूछा। उस समय मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह श्रवण करो। मैंने कहा - 'नन्द आदि गोप वसु के तथा वृषभानु आदि देवताओं के अवतार हैं। नरेश्वर कंस! इस व्रजभूमि में जो गोपियाँ हैं, उनके रूप में वेदों की ऋचायें आदि यहाँ निवास करती हैं। मथुरा में वसुदेव आदि जो वृष्णिवंशी हैं, वे सभी मूलतः देवता ही हैं। देवकी आदि समस्त स्त्रियाँ भी निश्चय ही देवाङ्गनायें हैं। सात बार गिन लेने पर सभी अङ्क आठ ही हो जाते हैं। तुम्हारे घातक की संख्या से गिना जाये तो यह प्रथम बालक भी आठवाँ हो सकता है, क्योंकि देवताओं की 'वामतो गति' है।"
श्रीनारदजी कहते हैं - "मिथिलेश्वर! उससे ऐसा कहकर जब मैं चला आया, तब देवताओं पर कंस अत्यन्त कुपित हुआ। उसने उसी क्षण यादवों का वध करने का निश्चय किया। उसने वसुदेव एवं देवकी को बेड़ियों में बाँधकर बन्दी बना लिया तथा देवकी के उस प्रथम-गर्भ जनित शिशु की शिलापृष्ठ पर पटककर हत्या कर दी। कंस को अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का स्मरण था, अतः भगवान विष्णु के भय से तथा अपने दुष्ट स्वभाव के कारण भी उसने इस भूतलपर प्रकट हुये देवकी के प्रत्येक बालक की जन्म लेते ही हत्या कर दी। ऐसा करने में उसे तनिक भी सङ्कोच नहीं हुआ। कंस के इन कुकृत्यों से यदुकुल-नरेश राजा उग्रसेन कुपित हो उठे। उन्होंने वसुदेवजी की सहायता की तथा कंस को अत्याचार करने से रोका। कंस के दुष्ट अभिप्राय को प्रत्यक्ष देख महान् यादव वीर उसके विरुद्ध उठ खड़े हुये। वे उग्रसेन के पीछे रहकर, खड्गहस्त हो उनकी रक्षा करने लगे। उग्रसेन के अनुगामियों को युद्ध के लिये उद्यत देख कंस के निजी वीर सैनिक भी उनका सामना करने के लिये तत्पर हुये। राजसभा के मण्डप में ही उन दोनों दलों का परस्पर युद्ध होने लगा। राजद्वार पर भी उन दोनों दलों के वीरों में परस्पर युद्ध छिड़ गया। वे सभी एक-दूसरे पर खड्ग का प्रहार करने लगे। इस संघर्ष में दस सहस्र मनुष्य मृत हो गये। तदनन्तर कंस ने गदा हाथ में लेकर पिता की सेना को कुचलना आरम्भ किया। उसकी गदा स्पर्श मात्र से ही अनेक मनुष्यों के मस्तक विदीर्ण हो गये, कितनों के पाँव कट गये, नख विदीर्ण हो गये, बाँहें कट गयीं तथा वे सभी निराश एवं निःसहाय हो गये। कुछ औंधे मुख एवं कुछ उतान होकर अस्त्र-शस्त्र लिये क्षणभर में धराशायी हो गये। अनेक वीर रक्त-वमन करते हुये मूर्छित हो गये एवं काल के गाल में चले गये। वहाँ इतना रक्त प्रवाहित हुआ कि सम्पूर्ण सभा-मण्डप रक्त-रञ्जित हो गया।
राजराजेश्वर! इस प्रकार दुष्ट एवं मदमत्त कंस ने कुपित हो उद्भट शत्रुओं को धराशायी करके अपने पिता को बन्दी बना लिया। उस दुष्ट ने उग्रसेन जी को राजसिंहासन से उतारकर पाश में बन्धक बनाकर उनके मित्रों सहित उन्हें भी कारागार में बन्दी बना लिया। मधु एवं शूरसेन की समस्त सम्पत्ति पर अधिकार करके कंस स्वयं सिंहासन पर आसीन होकर राज्य पर शासन करने लगा। समस्त पीड़ित यादव तत्काल चारों दिशाओं के विभिन्न देशों में पलायन कर गये तथा वहीं निवास करते हुये उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
देवकी का सातवाँ गर्भ उनके लिये हर्ष एवं शोक दोनों की वृद्धि करने वाला हुआ, उसमें साक्षात् अनन्तदेव अवतीर्ण हुये थे। योगमाया ने देवकी के उस गर्भ को सङ्कर्षण क्रिया द्वारा खींचकर व्रज में रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया। ऐसा हो जाने पर मथुरा के लोग खेद प्रकट करते हुये कहने लगे - 'अहो! बेचारी देवकी का गर्भ कहाँ चला गया? कैसे गिर गया? व्रज में उस गर्भ को गये पाँच ही दिन व्यतीत हुये थे कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को, स्वाती नक्षत्र में, बुधवार के दिन वसुदेव की पत्नी रोहिणी के गर्भ से अनन्तदेव का अवतार हुआ। उच्च स्थान में स्थित पाँच ग्रहों से घिरे हुये तुला लग्न में, दोपहर के समय बालक का जन्म हुआ। उस जन्म वेला में जब देवता पुष्पवर्षा कर रहे थे तथा मेघ वारिबिन्दु बिखेर रहे थे, प्रकट हुये अनन्तदेव ने अपनी अङ्गकान्ति से नन्दभवन को प्रकाशित कर दिया। नन्दरायजी ने भी उस शिशु का जातकर्म संस्कार करके ब्राह्मणों को दस लाख गौयें दान कीं। गोपों को आमन्त्रित कर उत्तम गान-विद्या में निपुण गायकों के संगीत सहित महान् मङ्गलमय उत्सव का आयोजन किया। देवल, देवरात, वसिष्ठ, बृहस्पति तथा मुझ नारद सहित श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास भी वहाँ पधारे तथा नन्दजी द्वारा अर्पित पाद्य आदि उपहारों से अत्यन्त प्रसन्न हुये।
नन्दरायजी ने पूछा - 'महर्षियों! यह सुन्दर बालक कौन है, जिसके समान दूसरा कोई अन्य प्रतीत नहीं होता? महामुने! इसका जन्म पाँच ही दिवस में कैसे हुआ? कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें।'
श्रीव्यासजी बोले - 'नन्द! तुम्हारा अद्भुत सौभाग्य है, इस शिशु के रूप में साक्षात् सनातन देवता शेषनाग पधारे हैं। सर्वप्रथम तो मथुरापुरी में वसुदेव द्वारा देवकी के गर्भ में इनका आविर्भाव हुआ। तदुपरान्त भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से इनका देवकी के उदर से कल्याणमयी रोहिणी के गर्भ में आगमन हुआ है। नन्दराय! ये योगियों के लिये भी दुर्लभ हैं, किन्तु तुम्हें इनका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। मैं महामुनि वेदव्यास इनके दर्शन हेतु ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ, अतः तुम शिशुरूपधारी इन परात्पर देवता का हम सभी को दर्शन कराओ।'"
श्रीनारदजी कहते हैं - "राजन्! तदनन्तर नन्द ने आश्चर्यचकित होकर शिशुरूपधारी शेष जी का उन्हें दर्शन कराया। पालने में विराजमान शेष जी का दर्शन करके सत्यवतीनन्दन व्यास जी ने उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति की।
श्रीव्यासजी बोले - 'भगवन्! आप देवताओं के भी अधिदेवता एवं सभी मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप साक्षात् अनन्तदेव शेषनाग हैं, बलराम हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप धरणीधर, पूर्णस्वरूप, स्वयंप्रकाश, हल धारण करने वाले, सहस्र मस्तकों से सुशोभित तथा संकर्षण देव हैं, आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आप ही बलदेव तथा श्रीकृष्ण के अग्रज हैं। हलायुध एवं प्रलम्बासुर के नाशक हैं। पुरुषोत्तम! आप मेरी रक्षा कीजिये। आप बल, बलभद्र तथा ताल के चिह्न से युक्त ध्वजा धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप नीलवस्त्रधारी, गौरवर्ण तथा रोहिणी के सुपुत्र हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप ही धेनुक, मुष्टिक, कुम्भाण्ड, रुक्मी, कृपकर्ण, कूट तथा बल्वल के शत्रु हैं। कालिन्दी की धारा को मोड़ने वाले तथा हस्तिनापुर को गङ्गा की ओर आकर्षित करने वाले आप ही हैं। आप द्विविद के विनाशक, यादवों के स्वामी तथा व्रजमण्डल के भूषण हैं। आप कंस के भ्राताओं का वध करने वाले तथा तीर्थयात्रा करने वाले प्रभु हैं। दुर्योधन के गुरु भी साक्षात् आप ही हैं। प्रभो! जगत् की रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले परात्पर देवता साक्षात् अनन्त! आपकी जय हो, जय हो। आपका सुयश समस्त दिगन्त में व्याप्त है। आप सुरेन्द्र, मुनीन्द्र तथा फणीन्द्रों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मुसलधारी, हलधर तथा बलवान हैं, आपको नमस्कार है। जो इस जगत् में सदा ही इस स्तवन का पाठ करेगा, वह श्रीहरि के परमपद को प्राप्त होगा। संसार में उसे शत्रुओं का संहार करने वाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा। उसकी सदा जय होगी तथा वह प्रचुर धन का स्वामी होगा।"
श्रीनारदजी कहते हैं - "राजन्! पराशरनन्दन विशाल-बुद्धि बादरायण मुनि सत्यवतीकुमार श्रीकृष्णद्रैपायन वेदव्यास उन मुनियों के सहित बलरामजी को सौ बार प्रणाम एवं परिक्रमा करके सरस्वती नदी के तट पर चले गये।"
इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता में गोलोकखण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद-बहुलाश्र-संवाद में बलभद्रजी के जन्म की कथा पूर्ण हुयी।