
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
पूर्णिमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हल षष्ठी के रूप में मनाया जाता है। अमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग में यह पर्व श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को आता है। हालाँकि दोनों ही पञ्चाङ्गों में हल षष्ठी का दिन एक ही है, केवल पञ्चाङ्ग के आधार पर माह का नाम भिन्न होता है। हल षष्ठी को हल छठ अथवा हर छठ, ललही छठ, चन्दन छठ, कमर छठ एवं खमर छठ आदि नामों से भी जाना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के अनुसार यह पर्व ऊब छठ, चन्द्र छठ, तिनछठी अथवा तिन्नी छठ तथा चानन छठ अथवा चना छठ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन हिन्दु स्त्रियाँ एक दिवसीय व्रत का पालन करती हैं। यह व्रत भगवान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता भगवान बलराम को समर्पित होता है। हल षष्ठी व्रत सन्तान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता की कामना से किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार जिन दम्पतियों को सन्तान सुख की प्राप्ति नहीं हुयी है, वे भी इस व्रत को कर सकते हैं। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से भगवान बलराम का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियाँ हल द्वारा जोती गयी फसल से प्राप्त किसी भी वस्तु का सेवन नहीं करती हैं, क्योंकि हल को बलराम जी का शस्त्र माना गया है। अतः हल षष्ठी के व्रत में हल से जोते गये खाद्य पदार्थ वर्जित होते हैं। इस दिन कुण्ड, सरोवर, तालाब आदि जलस्रोतों में उगाई गयी वस्तुओं का सेवन कर व्रत किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार हल षष्ठी व्रत में गाय के दूध व दही आदि का प्रयोग भी निषिद्ध होता है। अतः इस दिन स्त्रियाँ भैंस के दूध-दही का प्रयोग करती हैं। अनेक क्षेत्रों में हल षष्ठी के दिन स्त्रियाँ पारम्परिक रूप से महुआ की दातुन एवं महुआ का सेवन करती हैं।
हल षष्ठी के दिन चन्दन घिसकर टीका लगाया जाता है, जिसके कारण इसे चन्दन छठ भी कहा जाता है। तदुपरान्त अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार श्रीगणेश-लक्ष्मी, छठी मैया अथवा अपने इष्ट देवता की पूजा-अर्चना की जाती है। हालाँकि क्षेत्रीय विविधताओं के आधार पर हल षष्ठी के दिन भगवान शिव, देवी पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय, नन्दी, सिंह तथा नाव आदि का पूजन भी किया जाता है।
पूजन में भगवान को कुमकुम, चन्दन, पुष्प, फल, सुपारी, अक्षत् एवं सिक्का अर्पित करते हैं। तदुपरान्त धूप, दीप आदि प्रज्वलित कर हाथ में चन्दन लेकर हल षष्ठी की कथा श्रवण करते हैं। कुछ लोग मुख में भी चन्दन रखते हैं। कथा श्रवण करने के उपरान्त चन्द्रोदय होने तक न ही जल ग्रहण करते हैं न ही भूमि आदि पर कहीं भी बैठते हैं। चन्द्रोदय होने पर अर्घ्यदान करने के उपरान्त ही व्रत पूर्ण किया जाता है तथा बैठा जाता है।
शेखावाटी क्षेत्र में हल षष्ठी को ऊब छठ या चना छठ कहा जाता है। विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु तथा कुँवारी कन्यायें सुयोग्य वर की प्राप्ति हेतु ऊब छठ का व्रत एवं पूजन करती हैं। ऊब छठ के अवसर पर मन्दिर जाकर भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है। तदुपरान्त चन्द्रोदय होने पर चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। अर्घ्यदान के उपरान्त ही व्रत पूर्ण किया जाता है। इस व्रत में स्त्रियाँ सूर्यास्त के उपरान्त चन्द्रोदय होने तक खड़ी रहती हैं, इसीलिये इसे ऊब छठ कहा जाता है।
सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त होकर सम्भव हो तो भूमि को लीपकर एक छोटे से जलयुक्त कुण्ड का निर्माण करें। असमर्थ होने पर केवल एक चौक पूर लें। तदुपरान्त झरबेरी, पलाश एवं गूलर की एक-एक शाखा बाँधकर कुण्ड में गाड़ दें। इन डालियों को ही हरछठ कहा जाता है। हरछठ पर कच्चे सूत का धागा अथवा जनेऊ बाँधकर गाँठ लगायें।
हरछठ के समीप ही एक लकड़ी की चौकी पर मिट्टी से गौरी-गणेश, भगवान शिव एवं कार्तिकेय निर्मित कर उनकी स्थापना करें। तदुपरान्त जितने पुत्र हों उतने मिट्टी के पात्रों में सात प्रकार के भुने अनाज एवं मेवा भरकर रखें। तदुपरान्त गौरी-गणेश, भगवान शिव एवं कार्तिकेय का पूजन करें।
पूजन के अन्तर्गत सतनजा अर्थात् गेहूँ, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा तथा जौ को भूनकर अर्पित करें। इसके अतिरिक्त हल्दी से रंगा हुआ एक नवीन वस्त्र एवं सुहाग की सामग्री अर्पित करें। तदुपरान्त आरती आदि कर पूजन सम्पन्न करें।
छठ माता की पूजा करने हेतु दीवार पर अथवा कलश पर छठ माता का चित्र बनाकर अथवा झरबेरी, पलाश एवं गूलर की डालियों से छठ मैया बनायें। एक मिट्टी के कलश में जल भरकर चौकी पर स्थापित करें। उस कलश पर भैंस के घी में सिन्दूर मिश्रित कर षष्ठी माता अर्थात् छठी मैया का चित्र बनायें। तदनन्तर निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करते हुये छठ माता से प्रार्थना करें।
गंगा द्वारे कुशावर्ते बिल्वके नील पर्वते।
स्नात्या कनखले देवि हरं सन्धवती पतिम्॥
ललिते सुभगे देवि सुख सौभाग्य दायिनी।
अनन्त देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः॥
मन्त्रार्थ - "हे देवी! आपने गङ्गा, कुशावर्त, बिल्वक, नील पर्वत तथा कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया है। सुख एवं सौभाग्य प्रदान करने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अटल सुहाग प्रदान करने की कृपा करें।"
अन्त में व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु हल षष्ठी व्रत कथा का पाठ करें। कुछ भक्तगण इस दिन श्री बलराम जन्म कथा का पाठ एवं श्रवण भी करते हैं।
पूजन सम्पन्न होने पर भुना हुआ सतनजा बच्चों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में मातायें हल्दी के जल में भीगा हुआ नवीन वस्त्र का टुकड़ा अपने पुत्र की कमर पर मारती हैं, तत्पश्चात् उसे अपने आँचल से पोंछ देती हैं। इसे एक प्रकार का सुरक्षा कवच माना जाता है।