चामुण्डा मातृका भी हिन्दु धर्म में पूजी जाने वाली सप्त मातृकाओं में से एक हैं। मान्यताओं के अनुसार, प्राचीनकाल में विन्ध्य पर्वत पर निवास करने वाले वनवासी लोग देवी चामुण्डा की पूजा किया करते थे। देवीपुराण में देवी चामुण्डा का वर्णन उन पाँच देवियों के अन्तर्गत किया गया है, जिन्होंने भगवान गणेश की एक दैत्य का संहार करने में सहायता की थी।
देवी चामुण्डा को देवी चामुण्डी एवं देवी चर्चिकी के नाम से भी जाना जाता है। देवी चामुण्डा को देवी काली का ही स्वरूप माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, चण्ड एवं मुण्ड नामक दैत्यों का वध करने के पश्चात् देवी काली ही समस्त लोकों में देवी चामुण्डा के नाम से विख्यात हुयी हैं।

वाराहपुराण में प्राप्त सप्तमातृका उत्पत्ति वर्णन के अनुसार, चण्ड एवं मुण्ड नामक दैत्यों का संहार होने के उपरान्त रक्तबीज नामक राक्षस भीषण दैत्यों की सेना सहित देवी भगवती पर आक्रमण करने लगा। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि, जिस भी स्थान पर उसके रक्त की बूँद टपकेगी उसी स्थान पर रक्तबीज का एक और स्वरूप प्रकट हो जायेगा। रक्तबीज के साथ नाना प्रकार के राक्षसों को अपनी ओर आता देख देवी ने भीषण युद्धघोष किया। उसी समय देवी के श्री मुख से हँस पर आरूढ़ ब्राह्मणी मातृका प्रकट हुयीं, देवी ब्राह्मणी के नेत्रों से त्रिनेत्रधारी माहेश्वरी प्रकट हुयीं, माहेश्वरी मातृका के सिंह से कौमारी मातृका का प्राकट्य हुआ, देवी कौमारी के नेत्रों से गरुड़ पर आसीन वैष्णवी की उत्पत्ति हुयी तथा वैष्णवी के पृष्ठ से शेषनाग पर विराजमान वाराही मातृका का प्राकट्य हुआ, जिनके हृदय से नारसिंही प्रकट हुयीं तथा अन्त में देवी नारसिंही के पावन चरण कमलों से देवी चामुण्डा का प्रादुर्भाव हुआ।
देवी चामुण्डा को भिन्न-भिन्न स्थानों पर चतुर्भुज एवं द्वादशभुज रूप में वर्णित किया गया है। चतुर्भुज रूप में देवी अपनी दो भुजाओं में शङ्ख एवं त्रिशूल धारण करती हैं तथा उनके अन्य दो हाथ वरद मुद्रा एवं अभय मुद्रा में रहते हैं। देवी चामुण्डा सियार पर आरूढ़ रहती हैं।
द्वादशभुजी रूप में देवी चामुण्डा को डमरू, त्रिशूल, सर्प, खट्वाङ्ग, तलवार, खड्ग, वज्र, दण्ड, कटा हुआ मस्तक, माँस युक्त कटार, रक्त से भरा कपाल अथवा पानपात्र तथा अभय मुद्रा सहित दर्शाया जाता है। इस रूप में देवी माँ एक प्रेत के शव पर आसीन रहती हैं।
विष्णुधर्मोत्तरपुराण एवं पुर्वकर्णगमा आदि धर्मग्रन्थों के आधार पर देवी चामुण्डा के आयुधों में भेद प्राप्त होता है।
नमस्कार मन्त्र -
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥