देवी नारसिंही को सप्त मातृकाओं में से एक मातृका के रूप में पूजा जाता है। देवी नारसिंही, भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की शक्ति हैं। उनका स्वरूप भी भगवान नृसिंह के स्वरूप की भाँति ही है। देवी का विकराल स्वरूप शत्रुओं को भयाक्रान्तित करता है। देवी नारसिंही को नरसिंहिका एवं प्रत्यङ्गिरा भी कहा जाता है।
कुछ क्षेत्रों में नारसिंही मातृका के स्थान पर चामुण्डा मातृका को सम्मिलित किया जाता है। नेपाल सहित कुछ अन्य स्थानों पर अष्ट मातृकाओं की उपासना की जाती है। देवी नारसिंही की आराधना से ज्ञात-अज्ञात समस्त प्रकार के भय एवं दुष्कृत नष्ट होते हैं।

अन्य अनेक धर्म ग्रन्थों सहित वाराहपुराण में सप्त मातृकाओं की उत्पत्ति का वर्णन प्राप्त होता है, जिसके अनुसार, जिस समय रक्तबीज नामक राक्षस नाना प्रकार के दैत्यों की सेना सहित देवी भगवती से युद्ध करने हेतु आया, उसी समय देवी ने भीषण युद्धघोष किया।
युद्धघोष करते ही देवी के श्री मुख से हँस पर आरूढ़ ब्राह्मणी मातृका का प्राकट्य हुआ, देवी ब्राह्मणी के नेत्रों से त्रिनेत्रधारी माहेश्वरी प्रकट हुयीं, माहेश्वरी मातृका के सिंह से कौमारी मातृका प्रकट हुयीं, देवी कौमारी के नेत्रों से गरुड़ पर आसीन वैष्णवी का प्राकट्य हुआ तथा वैष्णवी के पृष्ठ से शेषनाग पर विराजमान वाराही मातृका उत्पन्न हुयीं, जिनके हृदय से देवी नारसिंही का प्रादुर्भाव हुआ था।
देवी नारसिंही को चतुर्भुज रूप में पीत वस्त्र धारण किये दर्शाया जाता है। देवी अपनी दो भुजाओं में सुदर्शन चक्र एवं शङ्ख धारण करती हैं तथा उनकी अन्य दो भुजायें वरद मुद्रा एवं अभय मुद्रा में स्थित रहती हैं। नारसिंही मातृका को सिंह पर आरूढ़ दर्शाया जाता है। देवी नारसिंही से सम्बन्धित कुछ अन्य चित्रों में उन्हें भगवान विष्णु एवं भगवान शिव की भाँति शङ्ख, चक्र, त्रिशूल एवं डमरू धारण किये हुये चित्रित किया जाता है।
नमस्कार मन्त्र -
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥