भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में आठवें ज्योतिर्लिङ्ग का नाम त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग है। भगवान शिव का यह दिव्य ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरि की तलहटी में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। यह अत्यन्त मनोरम एवं दर्शनीय स्थान है जहाँ त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना हेतु देश-विदेश से विशाल सँख्या में श्रद्धालु आते हैं तथा भगवान शिव के दर्शन के साथ ही यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता का आनन्द भी लेते हैं। श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग, ब्रह्मगिरि, नीलगिरि तथा कालागिरि नामक तीन पर्वतों के मध्य में अवस्थित हैं। यहाँ तीन लिङ्ग एक ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में स्थित हैं जो भगवान शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा जी को प्रदर्शित करते हैं। मदिर परिसर में अनेक साधु-सन्तों की समाधियाँ भी विद्यमान हैं।

त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर के प्राङ्गण में ही एक कुण्ड स्थित है, जिसे कुशावर्त कुण्ड के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहाँ तीन जल स्रोत हैं, जिन्हें बिल्वतीर्थ, विश्वनाथतीर्थ तथा मुकुन्दतीर्थ के रूप में जाना जाता है तथा इस स्थान पर गङ्गा, जलेश्वर, रामेश्वर, गौतमेश्वर, केदारनाथ, राम, कृष्ण,परशुराम एवं श्री लक्ष्मी नारायण सहित विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।
विभिन्न अन्य हिन्दु पूजास्थलों की भाँति इस मन्दिर को भी मुगल शासक औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दिया गया था, जिसके पश्चात् वर्तमान मन्दिर का निर्माण पेशवा बालाजी बाजीराव ने करवाया था। त्र्यम्बक के समीप ही भारत की दूसरी सर्वाधिक दीर्घ नदी गोदावरी का उद्गम स्थल भी है। इस मन्दिर की एक यह भी विशेषता है कि, यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की वंशावली को संग्रहित किया गया है। शिव पुराण के अनुसार,त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग का दर्शन-पूजन करने समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।
काशी के विश्वेश्वर शिवलिङ्ग के माहात्म्य का वर्णन करने के उपरान्त, सूत जी कहते हैं, ऋषिगणों! सद्गुरु व्यास जी के मुख से श्रवण की हुयी श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग की कथा का वर्णन इस प्रकार है, "प्राचीन काल में गौतम नामक एक उत्तम गुणों से युक्त ऋषि अपनी धर्मपत्नी अहल्या के साथ निवास करते थे। गौतम ऋषि ने ब्रह्मगिरि पर्वत पर दस सहस्र वर्षों तक कठोर तप किया था। एक समय सौ वर्षों तक उस स्थान पर वर्षा नहीं हुयी, जिसके कारण भयङ्कर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गयी। अन्न तो छोड़िये सम्पूर्ण भूमि पर जल की एक बूँद भी उपस्थित नहीं थी, जिसके कारण उस स्थान से समस्त पशु, पक्षी, जीव, जन्तु, मुनि, मनुष्य आदि विस्थापित हो गये।
सभी प्राणियों की ऐसी दुर्दशा देखकर गौतम ऋषि ने छः माह वरुण देव की तपस्या की जिसके फलस्वरूप वरुण देव प्रकट हुये तथा गौतम ऋषि से वरदान माँगने को कहा। गौतम ऋषि ने वरुण देव से वर्षा करने का निवेदन किया। वरुण ने कहा, देव विधान के विरुद्ध वर्षा करना सम्भव नहीं, अतः मैं तुम्हे एक अक्षय जल प्रदान करता हूँ जो सदैव विद्यमान रहेगा, अतएव तुम एक गड्ढा निर्मित करो। गौतम ऋषि ने एक हाथ गहरा एक गड्ढे का निर्माण किया जिसमें वरुण ने अपना दैवीय अक्षय जल प्रदान करते हुये कहा, हे मुनिश्रेष्ठ! यह जल प्राणियों के लिये पुण्य तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित होगा एवं यह तुम्हारे ही नाम से (गौतमी नदी के रूप में) विश्व विख्यात होगा। इस पुण्य जल के तट पर सम्पन्न किये जाने वाले हवन-यज्ञ, जप-तप, पूजन तथा श्राद्ध-तर्पण आदि शुभ कर्मों का अक्षय फल प्राप्त होगा।
वरुण देव द्वारा प्रदान अक्षय जल को प्राप्त कर ऋषि वहीँ निवास कर होम आदि नित्य-नैमित्तिक कर्मों में संलग्न हो गये तथा पूजन-हवन हेतु आवश्यक सामग्रियों की पूर्ति हेतु जौ, धान एवं अनेक प्रकार के मुन्यन्न भूमि में रोप दिये। वह स्थान नाना प्रकार के अन्न-धान्य, फल-पुष्प, वृक्ष एवं लता-पताओं से सुशोभित हो रहा था। यह सूचना प्राप्त होते ही अनेक प्रकार के पशु-पक्षी, जीव-जन्तु एवं ऋषि-मुनि आदि अपने कुटुम्ब एवं शिष्यों सहित उस वन में आकर निवास करने लगे।
महर्षि गौतम के तपोबल से सम्पूर्ण वन में आनन्दमयी वातावरण हो गया था। कुछ समय व्यतीत होने पर, गौतम ऋषि के आश्रम में निवास कर रहे ब्राह्मणों की पत्नियों एवं अहल्या के मध्य जल के प्रसङ्ग को लेकर कुछ विवाद हो गया। उन ब्राह्मण पत्नियों ने अपने-अपने पतियों के मन में गौतम ऋषि के प्रति द्वेष एवं द्रोह की भावना उत्पन्न कर दी, जिससे भ्रमित होकर उन्होंने गौतम ऋषि का अहित करने के उद्देश्य से भगवान गणेश की तपस्या करने लगे। उन ब्राह्मणों के तप से प्रसन्न होकर, भगवान श्री गणेश प्रकट हुये एवं उनसे वरदान माँगने को कहा। गजानन गणपति को प्रणाम करते हुये, वे बोले, हे प्रभु! यदि आप प्रसन्न हैं तो ऐसा वर दें कि सभी ऋषि-मुनि गौतम ऋषि को आश्रम से निष्कासित कर दें।
ऋषियों के मुख से इस प्रकार द्वेषपूर्ण वचनों को सुनकर, भगवान गणेश ने कहा, "ऋषिगणों यह अत्यन्त अनुचित कार्य है, इस प्रकार तपस्या करके उत्तम शुभ वरदानों की प्राप्ति की जाती है तथा इस प्रकार किसी का अहित नहीं किया जाता। शास्त्रों के अनुसार, "अपने ऊपर उपकार करने वाले को कष्ट प्रदान करना सदैव स्वयं के लिये ही घातक सिद्ध होता है। परोपकारी को दुःख देने से स्वयं का ही नाश होता है।" ब्रह्मा जी ने सही ही कहा कि साधु कभी असाधुता एवं असाधु कभी साधुता को ग्रहण नहीं कर सकता है। पूर्व में अवर्षण एवं अकाल के कारण जब तुम सभी व्याकुल थे, तब महर्षि गौतम ने ही लोकहित की कामना से वरुण देव को प्रसन्न करके अक्षय जल प्राप्त किया एवं सभी के प्राणों की रक्षा की किन्तु तुम सभी अपने तप से उन्हें हानि पहुँचा रहे हो, तुम सभी स्त्रियों के मोह में अक्षम्य अपराध कर रहे हो। तुम्हारे ऐसा करने पर भी महान ऋषि गौतम तुम्हारे सुख की ही कामना करेंगे। अतः यह घोर पाप न करो एवं कोई अन्य वरदान माँग लो।
सूत जी ने कहा, "ब्राह्मणों! चतुरानन गणेश जी द्वारा कहे धर्मसङ्गत वचन उन ऋषियों को प्रिय नहीं लगे तथा वह वरदान के रूप में गौतम ऋषि के निष्कासन के हठ पर ही अटल रहे। भगवान भक्ति के वशीभूत होते हैं अतः वह बोले, "मैं तुम्हारे तप का फल प्रदान करने हेतु, तुम जिस कार्य की कामना कर रहे हो, उसे मैं अवश्य सम्पन्न करूँगा तदोपरान्त, प्रारब्ध में जो लिखा है, वह होकर ही रहेगा। यह वर देकर पार्वतीनन्दन गणेश वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
सूत जी कहते हैं, उन द्वेष की भावना से युक्त ऋषियों के कारण जो कुछ घटित हुआ उसका वर्णन ध्यानपूर्वक सुनो। कुछ समय पश्चात्, गणेश जी, गौतम ऋषि के जौ एवं धान के खेत में एक अत्यन्त दुर्बल गाय के रूप में आकर अन्न को चरने लगे। उसी समय संयोगवश वहाँ पर गौतम ऋषि आ गये। गौतम ऋषि अति दयावान थे अतः गौ को हाँकने हेतु जौ के कुछ तिनके लेकर उसकी ओर चले। मुनिश्रेष्ठ उस गौ को शनैः-शनैः हाँक ही रहे थे कि सहसा उनके गौतम ऋषि के हाथ से उनके तिनकों के स्पर्श होते ही उस गौ धराशायी हो गयी एवं उसके प्राण पखेरू उड़ गये।
गौतम ऋषि से द्वेष करने वाले वह ब्राह्मण वहीं पर छुपे हुये थे तथा गौ की मृत्यु होते ही वह सभी कहने लगे गौतम ने गौ-हत्या कर डाली। गौतम ऋषि भी अत्यधिक व्यथित हो उठे एवं अहल्या से कहने लगे, "देवी! सम्भवतः ईश्वर मुझ पर कुपित हैं, मुझसे गौ हत्या का पाप कैसे हो गया? मैं क्या करूँ? यह दृश्य देख वहाँ उपस्थित जान गौतम ऋषि को बारम्बार धिक्कारने लगे एवं बोले, गौ हत्या करने वाले का दर्शन भी हो जाये तो वस्त्र सहित स्नान करने का विधान है अतः तुम्हें इस आश्रम में निवास करने का कोई अधिकार नहीं है, तुम कुटुम्ब सहित यहाँ से निष्कासित हो जाओ। तुम्हारे इस आश्रम में वास करने से अग्निदेव एवं पितृगण हमारे द्वारा अर्पित हव्य-कव्य आदि स्वीकार नहीं करेंगे।
उन सभी के ऐसे कटु वचनों से आहत होकर गौतम ऋषि उस स्थान एक कोस की दूरी पर एक नवीन आश्रम का निर्माण कर उसमें निवास करने लगे। किन्तु ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर भी गौतम ऋषि से कहा कि, गौ हत्या के पाप के कारण किसी भी प्रकार के वैदिक हवन-यज्ञ आदि का अधिकार नहीं रह गया है। यह सुनकर, गौतम ऋषि व्यथित होकर मुनियों से अपनी शुद्धि हेतु बारम्बार प्रार्थना करने लगे। उनकी वेदनापूर्ण प्रार्थना को स्वीकार करते हुये वे ब्राह्मण बोले, "गौतम इस गौ हत्या के घोर पाप से मुक्ति प्राप्त करने हेतु तुम सर्वप्रथम अपने पाप को प्रकट करते हुये सम्पूर्ण पृथ्वी की तीन परिक्रमा करो, ततपश्चात् लौटकर इसी स्थान पर एक माह तक व्रत करो, तदोपरान्त इस ब्रह्मगिरि पर्वत की एक सौ एक परिक्रमा करके ही तुम्हारा यह पाप नष्ट होगा। अन्यथा तुम गङ्गा जी को यहाँ लाकर स्नान करो एवं एक करोड़ पार्थिव शिवलिङ्ग का निर्माण कर भगवान शिव की निष्ठापूर्वक उपासना करो। तदोपरान्त गङ्गास्नान कर इस ब्रह्मगिरि पर्वत की ग्यारह परिक्रमा करो। ततपश्चात् सौ घड़ों के जल से पार्थिव शिवलिङ्ग को स्नान कराने पर तुम्हारा कल्याण होगा।
यह सुनकर गौतम ऋषि बोले, ऋषिगणों! मैं आपकी आज्ञानुसार पार्थिव शिवलिङ्ग पूजन एवं ब्रह्मगिरि पर्वत की परिक्रमा करूँगा" इतना कहकर गौतम ऋषि ब्रह्मगिरी की परिक्रमा पूर्ण कर अहल्या सहित पार्थिव शिवलिङ्ग पूजन करने लगे।
गौतम ऋषि एवं अहल्या के भक्तिपूर्व पार्थिव पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष देवी पार्वती एवं सभी प्रमथगणों के साथ साक्षात प्रकट हो गये एवं उनसे बोले, "हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी आराधना से अति प्रसन्न हूँ, वर माँगों प्रिय। भगवान शिव के पावन-पुनीत स्वरूप का दर्शन कर गौतम ऋषि भाव विभोर हो उठे एवं महादेव को श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर भाँति-भाँति प्रकार से उनकी स्तुति करे लगे, शिव-शम्भु की अति दीर्घ स्तुति करने के पश्चात महर्षि गौतम दोनों कर जोड़ उनसे बोले, "हे सदाशिव! मेरे पापों को नष्ट कर मुझे निष्पाप करें, मुझसे अत्यन्त घोर अपराध हो गया है, प्रभु! मैं गौ हत्या का दोषी हूँ। मुझे मेरे पाप से मुक्त करें भोलेनाथ!"
गौतम ऋषि की हृदय वेदना को सुनकर भगवान शिव ने कहा, "हे मुने! तुम तो सर्वदा निष्पाप ही हो, तुम्हारे प्रति षड्यन्त्र किया गया था। तुम्हारे ही आश्रम के कुछ ऋषियों ने अपनी पत्नियों के द्वेष पूर्ण वचनों में आकर तुमसे छल किया था। तुम्हारे दर्शन मात्र से प्राणी निष्पाप हो जाते हैं अतः तुम भला कैसे पापी हो सकते हो? पापी तो वह दुष्ट हैं, जिन्होनें तुम्हे कष्ट पहुँचाया। वे निश्चय ही अधर्मी एवं हत्यारे हैं जिनके दर्शन से अन्य भी पापिष्ठ होते हैं। उनका कभी कल्याण नहीं होगा। भगवान शिव द्वारा षड्यन्त्र के विषय में ज्ञात होने पर गौतम ऋषि अत्यन्त आश्चर्यचकित हुये एवं विस्मयपूर्वक उमापति से बोले,हे भोलेनाथ! जो भी हुआ वह भला ही हुआ। यदि वह मुनिगण ऐसा नही करते, तो मुझे आपके दर्शन का सौभाग्य कैसे प्राप्त होता। अतः यह तो उनका मेरे प्रति उपकार है, धन्य हैं वह ऋषिगण प्रभु!
भगवान शिव प्रसन्नतापूर्वक बोले, "हे विप्रवर, तुम समस्त ऋषियों में सर्वोत्तम हो, मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ, अतः वर माँगों मुनिश्रेष्ठ!
गौतम ऋषि ने कहा, "हे परमात्मा शिव, आपके वचन परम सत्य हैं, किन्तु मुझपर गौ हत्या दोष लगा है अर्थात जो पाँच पुरुषों ने कह दिया उसे भी मिथ्या नहीं कर सकते। अतएव हे गंगेश्वर! मुझे पवित्र, पावन, पापनाशनी गङ्गा प्रदान कर इस लोक का कल्याण करें। हे गोपेश्वर आप तो अभी का शुभ एवं मंगल करने वाले हैं। आपको बारम्बार प्रणाम है प्रभु! यह प्रार्थना करते हुये गौतम ऋषि ने भगवान शिव के चरणकमलों को पकड़ कर उन्हें नमस्कार करने लगे। महादेव ने अपने भक्त की मनोकामना की पूर्ति हेतु उन्हें गङ्गाजल प्रदान किया, वह जल अत्यन्त रूपवती स्त्री के में परिवर्तित हो गया। गङ्गा जी का दर्शन पाकर गौतम ऋषि नमस्कार करते हुये उनकी स्तुति करने लगे। ऋषि बोले, "हे गङ्गे, तुम परम पावन पुनीत एवं पापनाशिनी हो, तुम्हीं ने समस्त लोकों एवं भुवनों को पवित्र किया है, अतः हे देवी! मुझ नर्कगामी गौतम को पवित्र करने की कृपा करो।
तदन्तर भगवान शिव ने गङ्गा जी से कहा, "हे देवी! तुम गौतम ऋषि को पवित्र कर वैवस्त मनु के अट्ठाईसवें कलियुग तक यहीं रहो।
देवी गङ्गा ने कहा, "हे गङ्गाधर! यदि आप भी देवी उमा एवं सभी गणों सहित यहाँ वास करें तथा समस्त नदियों में सर्वोच्च स्थान एवं माहात्म्य प्रदान करें, तो ही मैं इस भूतल पर निवास करुँगी।
देवी गङ्गा के वचन सुनकर भगवान शिव ने कहा, "तुम महान हो, मैं तुमसे भिन्न नहीं हूँ, तथापि मैं तुम्हारे वचनानुसार इसी स्थान पर वास करूँगा। यह सुनकर देवी गङ्गा अत्यन्त हर्षित हो उठीं एवं अन्तर्मन से भगवान शिव की स्तुति करने लगीं। उसी समय वहाँ विभिन्न देवतागण, ऋषिगण एवं समस्त तीर्थ क्षेत्र उपस्थित हुये तथा भक्तिभाव से गौतम ऋषि, देवी गङ्गा एवं भगवान शिव की पूजा-आराधना कर प्रार्थना करने लगे। उनके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर भगवान शिव एवं देवी गङ्गा ने देवताओं एवं ऋषियों से वरदान माँगने को कहा।
देवताओं ने कहा, "हे गङ्गाधर शिव! हे परम पवित्र देवी गङ्गे! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक कोई वर प्रदान करना ही चाहते हैं, तो हमारे एवं समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु आप यहीं निवास करने की कृपा करें।
माता गङ्गा ने कहा, "हे देवगणों! लोक कल्याण हेतु तो आपको स्वयं यहाँ निवास करना चाहिये। मेरा आगमन गौतम ऋषि के पापों का प्रक्षालन करने हेतु हुआ था, अतः मैं अपना कार्य सम्पन्न कर लौट जाऊँगी। मुझे यह कैसे ज्ञात हो कि, आपके समाज में मेरा क्या महत्त्व है? यदि आप मेरे महत्त्व एवं विशेषता को प्रमाणित करें, तो मैं निःसन्देह इसी स्थान पर निवास करुँगी।"
देवी गङ्गा के वचनों का श्रवण कर सभी देवगण बोले, "समस्त सरिताओं में सर्वोत्तम गङ्गे, "देवगुरु बृहस्पति के सिंह राशि में स्थित होने पर हम सभी देवताओं का यहाँ आगमन होगा। ग्यारह वर्षों तक प्राणियों द्वारा प्रक्षालित पापों के प्रभाव से मलिन होने पर उन पापों को नष्ट करने हेतु हम अवश्य यहाँ पधारेंगे। अतः सम्पूर्ण सृष्टि पर कृपादृष्टि करने हेतु आपको एवं भगवान शिव को यहाँ निरन्तर वास करना चाहिये। जितनी समयावधि के लिये गुरु ग्रह सिंह राशि में स्थित रहेंगे, उतनी ही अवधि के लिये हम सभी देवता यहाँ उपस्थित रहेंगे तथा त्रिकाल स्नान करके भगवान शिव के दर्शन कर पवित्र होंगे। तत्पश्चात् तुम्हारी आज्ञा लेकर ही हम सभी अपने-अपने लोकों को प्रस्थान करेंगे।
सूत जी के अनुसार,समस्त देवताओं एवं ऋषियों के प्रेमपूर्वक अनुरोध पर भगवान शिव, त्रयम्बक ज्योतिर्लिङ्ग एवं देवी गङ्गा गौतमी के रूप में उसी स्थान पर प्रतिष्ठित हो गये। गौतमी को गोदावरी के रूप में जाना जाता है। देवताओं के वचनानुसार उसी समय से जब भी देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में स्थित होते हैं, तब समस्त देवतागण, तीर्थ-क्षेत्र, सरोवर, गङ्गा आदि नदियाँ एवं स्वयं भगवान श्री विष्णु गौतमी के तट पर उपस्थित होते हैं एवं वहाँ वास करते हैं तथा जिस अन्तराल में वह सभी देवता गौतमी के तट पर निवास करते हैं, उस समयान्तराल में उन देवताओं का अपने-अपने लोकों एवं स्थानों पर पूजन करने का कोई भी पुण्य फल प्राप्त नहीं होता है। उन देवताओं के गौमती तट से लौटकर आने पर ही उनकी पूजा-अर्चना का फल प्राप्त होता है।
भगवान शिव का त्रयम्बक ज्योतिर्लिङ्ग स्वयं गौतम ऋषि द्वारा पूजित है तथा इसकी पूर्ण भक्तिभाव से दर्शन, स्तुति-वन्दना एवं पूजा-अर्चना करने वाला इस लोक में समस्त अभीष्ट मनोरथों को पूर्ण कर परलोक में मोक्ष को प्राप्त होता है। अतः श्री त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंङ्ग का दर्शन-पूजन अवश्य ही करना चाहिये।
॥इति श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग उत्पत्तिः कथा सम्पूर्णः॥