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Brihaspati Pradosha Vrat Katha

DeepakDeepak

Brihaspati Pradosha Katha

Brihaspati Pradosha Vrat Katha

Story of a demon named Vritrasura

शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषियों के समक्ष बृहस्पति त्रयोदशी प्रदोष व्रत की कथा का वर्णन करते हुये सूतजी कहते हैं - "एक समय देवराज इन्द्र एवं वृत्र नामक राक्षस के मध्य भीषण युद्ध हुआ। उस समय देवताओं ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सेना को परास्त कर दिया। विशाल सङ्ख्या में अपने सैनिकों को मृत देखकर वृत्रासुर क्रोधित हो उठा तथा वह स्वयं युद्ध के लिये तत्पर हो गया। उसने अपनी आसुरी माया की शक्ति से अत्यन्त विकराल एवं भयावह रूप धारण कर लिया तथा देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगा।

वृत्रासुर के भयङ्कर रूप को युद्धभूमि में देखते ही इन्द्रादि सभी देवगण भयभीत हो उठे तथा उन्होंने सहायता हेतु देवगुरु बृहस्पति का आवाहन किया। देवताओं की प्रार्थना सुनकर देवगुरु वहाँ प्रकट हुये तथा देवताओं से उनकी चिन्ता का कारण पूछा।

इन्द्रादि देवताओं ने कहा - 'हे गुरुदेव! वृत्र नामक भयङ्कर दैत्य ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया है, वह अत्यन्त शक्तिशाली है कृपया हमारी सहायता करें एवं इस सङ्कट के निवारण का मार्ग बतायें।'

देवगुरु बृहस्पति ने कहा - 'हे देवेन्द्र! यह वृत्रासुर अत्यन्त मायावी है, मैं तुम्हें उसकी कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो - वृत्रासुर अति तपस्वी एवं निष्ठावान था, उसने गन्धमादन पर्वत पर कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया था। पूर्व जन्म में वह राक्षस चित्ररथ नामक राजा था। तुम्हारे राज्य के समीप में स्थित सुन्दर वन में इसका साम्राज्य था। उस वन में अनेक साधु, सन्त, महात्मा आदि तप एवं साधना करते थे। भगवत्प्राप्ति हेतु वह स्थान अत्यन्त अनुकूल माना जाता है।

एक समय चित्ररथ भ्रमण करते हुये कैलाश पर्वत पर पहुँच गया। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपनी अर्धाङ्गिनी देवी पार्वती सहित विराजमान होकर एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे। चित्ररथ उनके स्वरूप का तथा उनके समीप विराजमान देवी पार्वती का दर्शन करके हाथ जोड़कर उपहास करते हुये भगवान शिव से बोला - 'हे भगवन्! हम तो साधारण जीव हैं, इसीलिये माया के वशीभूत होकर स्त्रियों के मोह में फँसे रहते हैं, किन्तु देवलोक में तो कहीं भी मैंने किसी को स्त्री सहित सभा में विराजमान नहीं देखा।'

चित्ररथ के मुख से इन व्यङ्गपूर्ण वचनों को श्रवण करके भगवान शिव हँसते हुये बोले - 'हे राजन्! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण अन्य सभी से भिन्न है। मैंने कालकूट जैसे सृष्टि संहारक महाविष का पान किया है। इसके पश्चात् भी तुम अल्पज्ञानियों के समान मुझ पर व्यङ्ग कर रहे हो।'

देवी पार्वती भी चित्ररथ पर अत्यन्त कुपित हो उठीं तथा उसकी ओर दृष्टि करते हुये माता ने कहा - 'अरे दुष्ट प्राणी! तूने मेरे समक्ष मेरे स्वामी एवं समस्त चराचर जगत् में व्याप्त महादेव का उपहास किया है, अतः तुझे अपने इस पाप कर्म का दण्ड अवश्य भोगना होगा। इस सभा में उपस्थित सभी ज्ञानीजन समस्त शास्त्रों के तत्व को जानने वाले हैं। यहाँ उपस्थित सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार समस्त प्रकार के अज्ञान के नष्ट होने के उपरान्त शिव भक्ति में लीन हैं। अरे मूर्ख! तू स्वयं को अत्यन्त चतुर समझता है, अतः तुझे यह सीख मिलनी ही चाहिये ताकि तू भविष्य में पुनः कभी सन्तों एवं विद्वानों की सभा का उपहास करने का दुस्साहस न कर सके। मैं तुझे शाप देती हूँ कि तत्क्षण ही तू अपने इस विमान से पतित होकर भूलोक पर जायेगा तथा राक्षस योनि में तेरा जन्म होगा।'

देवी जगदम्बा द्वारा शाप मिलते ही चित्ररथ अपने विमान से भूलोक पर जा गिरा एवं राक्षस योनि को प्राप्त हुआ तथा महासुर के नाम से कुख्यात हुआ। त्वष्टा नामक एक तपस्वी ऋषि ने अपने तपोबल से उस असुर को वृत्तासुर के रूप में प्रकट किया।'

बृहस्पति जी आगे कहते हैं - 'वृत्तासुर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये भगवान शिव की भक्ति करने लगा। शिव भक्ति के फलस्वरूप उसे अथाह बल एवं पराक्रम प्राप्त हुआ है। अतः शिवभक्त होने के कारण तुम उसे परास्त नहीं कर सकते। मेरा यही सुझाव है कि यदि तुम उस महापराक्रमी दैत्य पर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो बृहस्पति प्रदोष व्रत का भक्तिपूर्वक पालन करो।'"

सूतजी कहते हैं - "देवगुरु बृहस्पति के परामर्श के अनुसार देवताओं ने सम्पूर्ण विधि-विधान से गुरु प्रदोष व्रत का पालन किया जिसके फलस्वरूप वृत्तासुर की पराजय हुयी एवं देवलोक पर आये भीषण सङ्कट का निवारण हुआ। इस प्रकार जो भी इस परम पुण्य प्रदायक व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करता है, उसके समस्त कष्टों का शमन होता है तथा मनोवाञ्छित कामनाओं की पूर्ति होती है।"

॥इति श्री बृहस्पति प्रदोष व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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