हिन्दु धर्म में सप्त मातृकाओं के रूप में पूजी जाने वाली देवियों में वाराही मातृका को भी सूचिबद्ध किया जाता है। वाराही मातृका, भगवान विष्णु के वराहावतार की शक्ति हैं। वे देवी लक्ष्मी का अवतार हैं। देवी वाराही के स्वरूप की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में वाराही को कैवल्यरूपिणी के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है कैवल्य अर्थात् वे देवी जो पुनर्जन्म से मुक्ति प्रदान करती हैं।
देवी वाराही देवी ललिता की सेना की सेनापति हैं तथा उन्हें दण्डनायिका के नाम से भी जाना जाता है। तन्त्र सम्बन्धी धर्म ग्रन्थों में वाराही मातृका के पाँच रूपों का वर्णन किया गया है, जिन्हें स्वप्न वाराही, चण्ड वाराही, मही वाराही (भैरवी), क्रच्च वाराही एवं मत्स्य वाराही कहा गया है।

श्रीदुर्गा सप्तशती में प्राप्त वर्णन के अनुसार, जिस समय शुम्भ ने अपनी राक्षसी सेना को लेकर देवी चण्डिका पर आक्रमण किया था, उस समय देवी की सहायता हेतु, भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, देवराज इन्द्र एवं कुमार कार्तिकेय ने अपने गुण एवं लक्षणों के आधार पर शक्ति स्वरूपा देवियों को अपने शरीर से प्रकट किया था। उसी समय भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार की शक्ति माँ वाराही को प्रकट किया था। मूल रूप से भगवान विष्णु की शक्ति देवी लक्ष्मी हैं। अतः उनके वराह अवतार की शक्ति वाराही को देवी लक्ष्मी का ही अवतार माना जाता है।
देवी वाराही का स्वरूप भगवान वराह के समान ही वर्णित किया जाता है। देवी वाराही श्याम वर्ण की हैं, उन्हें चतुर्भुज रूप में भैंसे पर आरूढ़ दर्शाया जाता है। देवी के दो हाथों में दण्ड एवं हल सुशोभित है तथा उनकी शेष दो भुजायें अभय मुद्रा एवं वरद मुद्रा में स्थित हैं।
नमस्कार मन्त्र -
नमोऽस्तुते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः।
प्रसीद जगतां मातः वाराह्यै ते नमो नमः॥