हिन्दु धर्म में, ब्राह्मणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, इन्द्राणी, कौमारी, वाराही एवं चामुण्डा देवी का सप्त मातृकाओं के रूप में पूजन किया जाता है। परन्तु कुछ स्थानों पर देवी चामुण्डा के स्थान पर देवी नारसिंही की पूजा की जाती है तथा नेपाल सहित उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में अष्ट मातृकाओं एवं नव मातृकाओं की आराधना की जाती है, जिनमें अष्टम अथवा नवम मातृका के रूप में देवी विनायकी को सम्मिलित किया जाता है।
विनायकी मातृका भगवान गणेश की शक्ति हैं तथा उनका स्वरूप भी गणेश जी के समान ही है। वे गजानन हैं, अर्थात् गणेश जी की भाँति ही, देवी विनायकी भी गजमुख धारण करती हैं। इसीलिये, देवी को गजमुखी, विघ्नेश्वरी एवं गजाननी आदि नामों से भी जाना जाता है।

प्राचीन काल में अन्धकासुर नामक दैत्य था, जिसको रक्तबीज के समान ही यह वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की बूँद भूमि से स्पर्श होते ही अन्य अन्धकासुर उत्पन्न हो जाते थे। भगवान शिव एवं अन्धकासुर के मध्य भीषण युद्ध हो रहा था तथा अन्धकासुर के रक्त की बूँद भूमि से स्पर्श होते ही, अन्धकासुर का एक अन्य रूप प्रकट हो जा रहा था। इस समस्या का समाधान करने हेतु भगवान शिव ने अपने श्री मुख की अग्नि से देवी योगेश्वरी को प्रकट किया। शिव जी ने अन्धकासुर के रक्त को धरती पर गिरने से पूर्व ग्रहण करने का निवेदन किया।
इस स्थान पर भी देवी योगेश्वरी की सहायता करने हेतु सप्तमातृकायें प्रकट हुयीं थीं। उन्हीं सप्तमातृकाओं की उत्पत्ति के क्रम में भगवान विनायक की शक्ति के रूप में देवी विनायकी का प्रादुर्भाव हुआ। मत्स्यपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा वनदुर्गा उपनिषद सहित अनेक धर्मग्रन्थों में अन्धकासुर युद्ध में सम्मिलित रही देवियों में देवी विनायकी का वर्णन प्राप्त होता है।
देवी विनायकी का स्वरूप भगवान गणेश के समान वर्णित किया गया है। देवी विनायकी चतुर्भुज रूप में लाल रँग के वस्त्र एवं स्वर्णाभूषण धारण किये स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान रहती हैं। देवी को कुछ स्वरूपों में मूषक पर आरूढ़ दर्शाया जाता है। देवी अपनी दो भुजाओं में अङ्कुश और पाश धारण करती हैं तथा उनकी शेष दो भुजायें वरद मुद्रा एवं अभय मुद्रा में स्थित रहती हैं।
ध्यान मन्त्र -
रक्तवर्णं चतुर्भुजम् त्रिनेत्रम्।
चन्द्रशेखरम् गजास्याम् चन्द्ररोगघ्नीं॥
चन्द्रशेखरम् सुवम वरदाभयकराम्।
देविम् गणेशअङ्कस्थिताम परम् ध्यायेत्।
विनायकिम् देविम् सर्वकामफलप्रदाम॥