रुद्राक्ष इस पृथ्वी पर पायी जाने वाली सर्वाधिक पवित्र वस्तुओं में से एक है। यह साक्षात् भगवान शिव जी का ही स्वरूप होता है। श्रीशिवमहापुराण एवं श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण में रुद्राक्ष के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है। परमेश्वर शिव ने लीलावश अपने दोनों नेत्रों से अश्रुकण पृथ्वी पर टपकाये, जिससे रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुयी थी। भगवान शिव ने स्वयं ही वे रुद्राक्ष भगवान विष्णु के भक्तों तथा चतुर्वर्ण के लोगों के कल्याणार्थ वितरित किये थे।
रुद्राक्ष माहात्म्य के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति साक्षात् रुद्र हो जाता है। सभी मनुष्य रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं। इसमें किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं किया गया है। परमात्मा शिव ने जीव जगत पर कृपा करने के लिये ही रुद्राक्ष की सृष्टि की है। सम्पूर्ण विश्व ने रुद्राक्ष के धार्मिक एवं आयुर्वेदिक लाभ को स्वीकार किया है।
भारत में रुद्राक्ष उत्तराखण्ड के वनों के अतिरिक्त बंगाल, असम, मैसूर तथा नीलगिरी की पहाड़ियों में बहुतायत प्राप्त होते हैं। नेपाल और इण्डोनेशिया के रुद्राक्ष भी अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। रुद्राक्ष अनेक रंगों में जैसे श्वेत, श्याम, पीत तथा रक्त वर्ण में प्राप्त होते हैं। इनका पुष्प श्वेत तथा फल हरित आभा लिये हुये होता है। रुद्राक्ष के फल की गुठली ही वास्तव में 'रुद्राक्ष' है। जिसमें पड़ी हुयी धारियों को ही रुद्राक्ष का मुख कहा जाता है। इस प्रकार के रुद्राक्ष का मुख, रंग तथा आकार विशुद्ध रूप से प्राकृतिक होता है।
जहाँ नेपाल के रुद्राक्ष सामान्यतः हस्तामलक अर्थात् आँवले की आकृति के तो वही इण्डोनेशिया के रुद्राक्ष छोटे एवं काले रंग के होते हैं। शिव महापुराण में रुद्राक्ष के रंग तथा आकार के आधार पर उसके धारण और उपयोग का भिन्न-भिन्न फल वर्णित किया गया है। जो रुद्राक्ष आँवले के समान हो वह सम्पूर्ण अरिष्ट का नाशक माना गया है।
शिवपुराण के अनुसार रुद्राक्ष के पूजन एवं धारण करने से पापों का नाश होता है तथा शिवजी एवं माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में तो रुद्राक्ष की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है। रुद्राक्ष के प्रयोग से गम्भीर रोगों का उपचार भी किया जा सकता है। रक्तचाप, हृदय रोग, श्वेत प्रदर, कब्ज, मिर्गी आदि कितने ही रोगों की औषधि में रुद्राक्ष का प्रयोग किया जाता रहा है। रुद्राक्ष नकारात्मक शक्तियों से मनुष्य की रक्षा करता है। विभिन्न मुख के रुद्राक्षों के धारण करने का भिन्न-भिन्न फल शास्त्रों में वर्णित किया गया है। रुद्राक्ष अनेक प्रकार की ग्रह बाधाओं को दूर करने में भी सक्षम है। अकाल मृत्यु के भय से रक्षा हेतु तो सदैव रुद्राक्ष धारण करना ही चाहिये। यदि किसी कारणवश रुद्राक्ष धारण नहीं कर सकते तो रुद्राक्ष का शिवजी के समान पूजन एवं अभिषेक करना चाहिये।
रुद्राक्ष के अठ्ठाईस प्रकार के भेद माने गये हैं। भगवान शिव के दो नेत्रों में से एक सूर्य नेत्र से 12 कपिल वर्ण के रुद्राक्ष उत्पन्न हुये तथा दूसरे सोम नेत्र से 16 श्वेत वर्ण के रुद्राक्ष उत्पन्न हुये। श्वेत वर्ण के रुद्राक्ष को ब्राह्मणों के लिये, रक्त वर्ण के रुद्राक्ष को क्षत्रियों के लिये, पीत वर्ण के रुद्राक्ष वैश्यों के लिये तथा कृष्ण वर्ण के रुद्राक्ष पर शूद्रों का अधिकार बताया गया है। यहाँ वर्ण का अर्थ बड़ा व्यापक एवं अर्थपूर्ण है। प्राप्ति के आधार पर रुद्राक्ष 14 प्रकार के होते हैं। यद्यपि अनेक स्थानों पर 21 मुख तक के रुद्राक्षों का भी वर्णन प्राप्त होता है। किन्तु ये अत्यन्त दुर्लभ होते हैं। एकमुखी से लेकर चतुर्दश मुखी रुद्राक्ष का वर्णन शिवमहापुराण में भी आता है। इन सभी रुद्राक्षों के भिन्न-भिन्न देवता एवं महत्त्व वर्णित किये गये हैं।
1. एकमुखी रुद्राक्ष एकमुखी रुद्राक्ष को साक्षात् भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। शिव महापुराण में भगवान शिव देवी पार्वती जी को बताते हैं कि एकमुखी रुद्राक्ष सम्पूर्ण भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है। इसका नित्य पूजन करने से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है। जिस स्थल पर एकमुखी रुद्राक्ष का पूजन होता है वहाँ के उपद्रव नष्ट हो जाते हैं। सूर्य ग्रह से सम्बन्धित समस्याओं का निवारण भी इस रुद्राक्ष के धारण या पूजन से हो जाता है।
ॐ ह्रीं नमः।
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2. द्विमुखी रुद्राक्ष यह रुद्राक्ष अर्धनारीश्वर या देवदेवेश्वर बताया गया है। वैवाहिक जीवन की परेशानियों और मानसिक अशान्ति का निवारण करने में इसकी बड़ी भूमिका होती है। ज्योतिष में दो मुखी रुद्राक्ष को चन्द्रमा से सम्बन्धित माना जाता है। इसीलिये चन्द्रमा से जुड़े अरिष्ट के निवारण में दोमुखी रुद्राक्ष प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
ॐ नमः।
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3. त्रिमुखी रुद्राक्ष शिवपुराण के अनुसार तीन मुखी रुद्राक्ष साधन का फल प्रदान करने वाला होता है। अर्थात् तीन मुखी रुद्राक्ष का धारणकर्ता कम समय में सर्वोच्च सिद्धि एवं विद्या प्राप्त कर सकता है। ज्योतिष में इसका सम्बन्ध मङ्गल ग्रह से जोड़ा जाता है। तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा रक्त विकार का शमन होता है।
ॐ क्लीं नमः।
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4. चतुर्मुखी रुद्राक्ष चार मुखी रुद्राक्ष भगवान ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है। इसको धारण करने तथा इसके स्पर्श से चतुर्दिक पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। शिक्षा एवं ज्ञान पर इसका विशेष अधिकार होता है। इसे धारण करने से बुध ग्रह का प्रभाव शुभ होता है।
ॐ ह्रीं नमः।
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5. पञ्चमुखी रुद्राक्ष पाँच मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्निरुद्र स्वरूप है। यह रुद्राक्ष सामान्यतः सरलता से प्राप्त हो जाता है। इसे धारण करने से गुरु ग्रह के कुप्रभाव दूर होते हैं। आध्यात्मिक रूप से यह अत्यन्त सुदृढ बनाता है।
ॐ ह्रीं नमः।
ॐ नमः शिवाय।
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6. षड्मुखी रुद्राक्ष छः मुख वाला रुद्राक्ष भगवान कार्तिकेय का स्वरूप माना जाता है। इसे दाहिनी भुजा में धारण करने वाले व्यक्ति को ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्ति का मार्ग मिल जाता है। 6 मुखी रुद्राक्ष शुक्र ग्रह के नकारात्मक प्रभाव से साधक की रक्षा करता है।
ॐ ह्रीं हुं नमः।
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7. सप्तमुखी रुद्राक्ष सात मुखी रुद्राक्ष अनङ्ग नाम से प्रसिद्ध है। इसको धारण करने से दरिद्र व्यक्ति भी सम्पत्तिशाली हो जाता है। शनि ग्रह के दोष निवारण में यह रुद्राक्ष महत्त्वपूर्ण होता है। इसे धारण करने से स्वर्ण आदि की चोरी से उत्पन्न होने वाले पापों से मुक्ति मिलती है।
ॐ हुं नमः।
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8. अष्टमुखी रुद्राक्ष इस रुद्राक्ष को साक्षात् अष्टमूर्ति भैरव का स्वरूप माना जाता है। इसे धारण करने से अकालमृत्यु नहीं होती है। राहु से सम्बन्धित दोषों का निराकरण भी इस रुद्राक्ष को धारण करने से हो जाता है। इस रुद्राक्ष के द्वारा परस्त्री स्पर्श तथा अन्नचोरी जैसे अपराधों से मुक्ति प्राप्त होती है।
ॐ हुं नमः।
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9. नवमुखी रुद्राक्ष नौ मुखी रुद्राक्ष को केतु ग्रह की परेशानियों को दूर करने के लिये धारण किया जा सकता है। नौ रूपधारी माँ दुर्गा इसकी अधीष्टात्री तथा भैरव जी और कपिल मुनि नौमुखी रुद्राक्ष के प्रतीक माने गये हैं। भक्तिपरायण होकर बायीं भुजा में नौमुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला जातक भगवान शिव के समान हो जाता है। गर्भदोष का नाश भी इस रुद्राक्ष के धारण करने से होता है।
ॐ ह्रीं हुं नमः।
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10. दसमुखी रुद्राक्ष दस मुखी रुद्राक्ष भगवान शिव के अत्यन्त प्रिय श्रीहरि विष्णु जी के दसावतारों को समर्पित है। इसे धारण करने से मनुष्य की सारी बाधायें शान्त रहती है। भूत-प्रेत और अभिचार आदि समस्याओं का निवारण दस मुखी रुद्राक्ष धारण करने से हो जाता है।
ॐ ह्रीं नमः।
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11. एकादशमुखी रुद्राक्ष ग्यारह मुखी रुद्राक्ष के भगवान साक्षात् रुद्र ही हैं। इसे धारण करने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। भगवान शिव कार्तिकेय जी को बताते हैं कि एकादश मुखी रुद्राक्ष को धारण करने वाले मनुष्य को एक सहस्र अश्वमेध, एक सहस्र वाजपेय तथा एक सहस्र गोदान का फल मिलता है।
ॐ ह्रीं हुं नमः।
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12. द्वादशमुखी रुद्राक्ष बारह मुखी रुद्राक्ष जातक में नेतृत्व की क्षमता को विकसित करता है। इसमें द्वादश आदित्यों का तेज समाहित होता है। शिवपुराण के अनुसार बारह मुख वाले रुद्राक्ष को केश में धारण करने से मस्तक पर अभूतपूर्व तेज विद्यमान होता है। अटके हुये सभी कार्य बनते हैं तथा राजभय दूर होता है।
ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः।
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13. त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष तेरह मुख वाले रुद्राक्ष के विषय में शिव जी पार्वती माँ को बताते हैं कि इस रुद्राक्ष को धारण करने से सौभाग्य एवं मङ्गल की वृद्धि होती है। धारणकर्ता में एक विशेष आकर्षण आ जाता है जिससे लोग उसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। इस रुद्राक्ष पर विश्वदेवों का अधिकार होता है। इन्द्रदेव एवं अन्य देवताओं के आशीर्वाद से उसके जीवन में भोग-विलास की वृद्धि होती है।
ॐ ह्रीं नमः।
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14. चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष चौदह मुखी रुद्राक्ष साक्षात् परमशिव स्वरूप होता है। इसे भक्तिपूर्वक मस्तक पर धारण करने से शिवत्व की अवस्था प्राप्त हो जाती है। आध्यात्मिक उन्नति, शक्ति तथा धन प्राप्ति के लिये चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण किया जा सकता है।
ॐ नमः।
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नैमिषारण्य में महात्मा सूतजी ऋषियों को बताते हैं कि रुद्राक्ष को सिर, कण्ठ, कान, भुजाओं तथा उदर पर धारण किया जा सकता है। कभी भी टूटे-फूटे, कीड़ों के द्वारा दूषित तथा व्रणयुक्त रुद्राक्ष को धारण नहीं करना चाहिये। सिर पर ईशान मन्त्र से, कर्ण पर तत्पुरुष मन्त्र से, हृदय में अघोर मन्त्र से तथा उदर में वामदेव मन्त्र द्वारा 15 रुद्राक्षों से निर्मित माला धारण की जा सकती है। सामान्य जन यदि मात्र कण्ठ पर धारण करना चाहें तो प्रणव के साथ पञ्चाक्षर मन्त्र या कुछ विशेष मन्त्र जो की ऊपर विस्तार से वर्णित किये हुये हैं, से सिद्ध कर रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं। रुद्राक्ष धारण करने से एक दिन पूर्व उसे देसी घी में डुबा देना चाहिये। तदुपरान्त उसका भगवान शिव के समान पूजन एवं अभिषेक करके धारण करना चाहिये।
रुद्राक्ष धारण करने वाले जातक को माँस-मदिरा, लहसुन, प्याज, शलजम, सहजन तथा लिसोड़ा आदि को पूर्णतः त्याग देना चाहिये। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यासी सभी को रुद्राक्ष धारण करना चाहिये। बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा चारों वर्ण के जातकों का रुद्राक्ष पर अधिकार माना गया है। किन्तु रुद्राक्ष धारण करने के पश्चात् उसकी गरिमा एवं आचार-संहिता का ध्यान अवश्य रखें। विभिन्न आचार्यों के मन्तव्य के अनुसार रतिक्रिया के समय एवं किसी के दाहकर्म में सम्मिलित होने से पूर्व रुद्राक्ष को उतार देना चाहिये। तदुपरान्त शुद्ध होने के पश्चात् रुद्राक्ष धारण कर लेना उचित होता है। रुद्राक्ष को अशुद्ध हाथों से स्पर्श नहीं करना चाहिये। एक बार धारण किया हुआ रुद्राक्ष कभी भी शिवलिङ्ग से स्पर्श नहीं कराना चाहिये। यदि आप रुद्राक्ष धारण करते हैं तो प्रतिदिन शिव जी का जलाभिषेक अवश्य करें। यदि यह नित्य सम्भव नहीं तो कम से कम सोमवार या प्रदोष के दिन शिवार्चन निश्चित ही करें।