हिन्दु धर्म में ब्राह्मणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, इन्द्राणी, वाराही एवं चामुण्डा, इन सात देवियों की सप्त मातृकाओं के रूप में पूजा-अर्चना की जाती है। श्रीदुर्गा सप्तशती तथा मार्कण्डेयपुराण में सप्त मातृकाओं की उत्पत्ति का वर्णन प्राप्त होता है। मत्स्यपुराण तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी सप्त मातृकाओं के विषय में वर्णन किया गया है। किन्तु प्रत्येक स्थान पर सप्त मातृकाओं की उत्पत्ति के भिन्न-भिन्न कारण वर्णित किये गये हैं। इतिहासकारों को विभिन्न महान सभ्यताओं के कार्यकाल के दौरान सप्त मातृकाओं के पूजन के साक्ष्य प्राप्त होते रहे हैं।
सर्वप्रथम मातृकाओं का उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है। अतः मातृकाओं की उपासना वैदिक संस्कृति से आरम्भ हुयी मानी जाती है। कुछ विद्वानों के अनुसार मातृकाओं का पूजन यक्ष परम्परा का ही विस्तार है। पश्चिमी एशिया की कुछ प्राचीन संस्कृतियों में भी मातृकाओं की आराधना किये जाने के प्रमाण मिलते हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता में भी मातृका पूजन के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। उत्खनन में प्राप्त सिक्कों पर मातृका के समक्ष नर अथवा पशुबलि के चित्र अङ्कित किये गये हैं। मान्यताओं के अनुसार, पाँचवीं सदी के आरम्भ तक इन देवियों को हिन्दू धर्म में देवियों के रूप में सम्मिलित कर लिया गया था।
कुछ स्थानों पर सप्त मातृकाओं में देवी चामुण्डा के स्थान पर देवी नारसिंही का वर्णन प्राप्त होता है। नेपाल में अष्ट मातृकाओं की पूजा की जाती है, जिनमें विनायकी मातृका को भी सम्मिलित किया जाता है।