महाराज युधिष्ठिर बोले - "हे भगवन्! मुझे राज्य की प्राप्ति कराने हेतु अट्ठारह अक्षौहिणी सेना मृत्यु को प्राप्त हुयी है। इस पाप के विचार से मेरे चित्त में घृणा का भाव उत्पन्न हो रहा है। उस सेना में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि सभी मृत हुये हैं। भीष्म, द्रोण, कलिंगराज, कर्ण, शल्य, दुर्योधन आदि की मृत्यु से मेरे हृदय में अत्यधिक क्लेश हो रहा है। हे जगत्पते! इन पापों से मुक्ति प्राप्त करने हेतु कोई मार्ग बताने की कृपा करें।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - "हे पार्थ! एक अतिशय पुण्यप्रदायक व्रत है, जिसे गोवत्स द्वादशी के रूप में वर्णित किया गया है।"
युधिष्ठिर ने पूछा - "हे भगवन्! यह गोवत्स द्वादशी व्रत क्या है? इसका पालन करने का क्या विधान है तथा यह व्रत कब एवं कैसे प्रचलित हुआ था? हे प्रभो! मैं नरकार्णव में डूब रहा हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।"
भगवान् श्रीकृष्ण बोले - "हे पार्थ! सत्ययुग में पुण्यशाली जम्बूमार्ग के भड़ौच में नामव्रतधरा नामक पर्वत के टंटावि नामक रमणीय शिखर पर भगवान शिव के दर्शन की कामना से करोड़ों मुनिगण तपस्या कर रहे थे। वह तपोवन अतुलनीय दिव्य सघन वनों से शोभायमान हो रहा था। वहाँ महर्षि भृगु का आश्रम मण्डल सुशोभित था। वह स्थान विविध प्रकार के मृगगण एवं वानरों से समन्वित था। सिंह आदि सभी वन्य प्राणी आनन्दपूर्वक निर्भय होकर वहाँ एकत्र ही निवास करते थे।
एक समय तपस्या में लीन उन ऋषि-मुनियों से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देने का निश्चय किया तथा एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर मुनियों पर कृपा करने हेतु प्रकट हुये। शिव जी जर्जर-देह वाले वृद्ध ब्राह्मण के रूप में, हाथ में लकुटी लिये कम्पायमान होते हुये उस स्थान पर आये, जहाँ ऋषिगण तपस्यारत थे। उसी समय जगज्जननी माता पार्वती भी एक सुन्दर सवत्सा गौ का रूप धारण कर वहाँ प्रकट हो गयीं।
हे पार्थ! गौ का जो स्वरूप है, उसका श्रवण करें - प्राचीनकाल में क्षीरसागर के मन्थन के समय अमृत के साथ पाँच दिव्य गौ प्रकट हुयी थीं, जिन्हें नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला तथा बहुला के नाम से जाना जाता है। इन्हें धर्मग्रन्थों में लोकमाता कहा गया है। इनका अवतरण लोक-कल्याण तथा देवताओं की तृप्ति हेतु हुआ था। देवताओं ने अभीष्ट मनोरथों की सिद्धि करने वाली इन पाँच गौओं को महर्षि जमदग्नि, ऋषि भरद्वाज, ऋषि वसिष्ठ, असित मुनि तथा गौतम मुनि को प्रदान कर दिया था।
गौओं के छः अङ्ग, अर्थात् गोमय, रोचना, मूत्र, दुग्ध, दधि तथा घृत अत्यन्त पवित्र माने जाते हैं तथा ये संशुद्धि के साधन भी हैं। गोमय से भगवान शिव के प्रिय बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुयी है। बिल्ववृक्ष में पद्महस्ता देवी श्रीलक्ष्मी विराजमान रहती हैं, इसीलिये इसे श्रीवृक्ष भी कहा जाता है। गोमय से ही कमल के बीज उत्पन्न हुये हैं। गोरोचन अत्यन्त मङ्गलमय है, यह पवित्र एवं सर्वार्थसाधक है। गोमूत्र से गुग्गुल उत्पन्न हुआ था, जो अत्यन्त प्रिय एवं सुगन्धित है। यह गुग्गुल सभी देवताओं का, विशेषतः भगवान शिव का आहार है।
संसार में जो कुछ भी मूलभूत बीज हैं, वे सभी गोदुग्ध से उत्पन्न हुये हैं। प्रयोजन की सिद्धि हेतु सभी माङ्गलिक पदार्थ दधि से उत्पन्न हुये हैं। घृत से अमृत उत्पन्न होता है, जो देवों की तृप्ति का साधन है। ब्राह्मण एवं गौ एक ही कुल के दो भाग हैं। ब्राह्मणों के हृदय में वेदमन्त्र तथा गौओं के हृदय में हवि का वास होता है। गाय से ही यज्ञ प्रवृत्त होता है तथा गौ में ही समस्त देवगण प्रतिष्ठित हैं। गाय में ही छः अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेद समाहित हैं।
गौओं के शृङ्ग के मूल में सदैव ब्रह्मा तथा विष्णु विराजमान रहते हैं। शृङ्ग के अग्रभाग में सभी चराचर एवं समस्त तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। देवों के देव महादेव शिव, शृङ्ग के मध्य में विद्यमान रहते हैं। गौ के ललाट में देवी गौरी, नासिका में कार्तिकेय तथा नासिका के दोनों पुटों में कम्बल तथा अश्वतर नामक दो नाग विद्यमान रहते हैं। दोनों कानों में अश्विनी कुमार, नेत्रों में चन्द्र एवं सूर्य, दाँतों में आठों वसुगण, जिह्वा में वरुण, कुहर में सरस्वती, गण्डस्थलों में यम एवं यक्ष तथा ओष्ठों में दोनों सन्ध्यायें, ग्रीवा में इन्द्र, ककुद्, अर्थात् मौर में राक्षस, पार्ष्णि-भाग में द्यौ तथा जङ्घाओं में चारों चरणों सहित धर्म विराजमान रहता है। खुरों के मध्य में गन्धर्व, अग्रभाग में सर्प तथा पश्चिम भाग में राक्षसगण विराजमान हैं।
गौ के पृष्ठदेश में एकादश रुद्र, सभी सन्धियों में वरुण, श्रोणितट, अर्थात् कमर में पितर, कपोलों में मानव तथा अपान में स्वाहा रूप अलङ्कार को आश्रित कर श्री अवस्थित हैं। आदित्यरश्मियाँ केश-समूहों में पिण्डीभूत हो प्रतिष्ठित हैं। गोमूत्र में साक्षात् गङ्गा तथा गोमय में यमुना स्थित हैं। गौ के रोम-समूह में तैंतीस करोड़ देवगण प्रतिष्ठित हैं। उदर में वनों एवं पर्वतों सहित पृथ्वी अवस्थित है। चारों पयोधरों में चार महासमुद्र स्थित हैं। क्षीर धाराओं में मेघ, वृष्टि एवं जलविन्दु विद्यमान हैं, जठर में गार्हपत्याग्रि, हृदय में दक्षिणाग्नि, कण्ठ में आहवनीयाग्नि तथा तालु में सभ्याग्नि अवस्थित है। गौओं की अस्थियों में पर्वत तथा मज्जाओं में यज्ञ स्थित हैं। सभी वेद भी गौओं में प्रतिष्ठित हैं।
हे युधिष्ठिर! भगवती उमा ने उन सुरभियों के रूप का स्मरण कर स्वयं भी वैसा ही रूप धारण कर लिया। छः स्थानों से उन्नत, पाँच स्थानों से निम्न, मण्डूकनेत्रा, सुन्दर पूँछ वाली, ताम्र के समान रक्त स्तन वाली, चाँदी के समान उज्ज्वल कटिभाग वाली, सुन्दर खुर एवं सुन्दर मुख वाली, श्वेतवर्णा, सुशीला, पुत्रस्नेहवती, मधुर दुग्ध वाली, शोभन पयोधर वाली, सभी शुभ लक्षणों से युक्त सवत्सा गोरूपधारिणी देवि उमा को वृद्धविप्ररूपधारी भगवान शिव आनन्दपूर्वक चरा रहे थे। हे पार्थ! शनैः-शनैः भगवान शिव उस आश्रम में गये तथा कुलपति भृगु के सम्मुख उस गाय को न्यास रूप में दो दिन तक सुरक्षा करने हेतु भृगु ऋषि को प्रदान कर दिया।
गो प्रदान करते हुये विप्ररूपी भगवान शिव ने कहा - 'हे मुने! मैं यहाँ स्नान कर जम्बूक्षेत्र को प्रस्थान करूँगा तथा दो दिवस उपरान्त लौटूँगा तब तक आप इस गाय की रक्षा करें।'
मुनिगणों ने भी उस गौ की सभी प्रकार से रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हुये उन्हें आश्वस्त किया। भगवान शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। कुछ समय पश्चात् भगवान शिव एक व्याघ्र के रूप में वहाँ प्रकट हो गये तथा गौ एवं उसके बछड़े को भयभीत करने लगे। ऋषिगण भी व्याघ्र के भय से आर्तनाद करने लगे तथा यथाशक्ति व्याघ्र को भगाने का प्रयास करने लगे। व्याघ्र के भय से वह सवत्सा गौ भी कूद-कूदकर रँभाने लगी।
हे युधिष्ठिर! व्याघ्र के भय से व्याकुल होकर भागने पर गौ के चारों खुरों का चिह्न शिला के मध्य में अङ्कित हो गया। आकाश में देवताओं एवं किन्नरों ने व्याघ्र, अर्थात् भगवान् शिव एवं सवत्सा गौ, अर्थात् माता पार्वती की स्तुति-वन्दना की। शिला का वह चिह्न वर्तमान में भी सुस्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जिस स्थान पर वह चरण चिह्न विद्यमान हैं, वह नर्मदा जी का उत्तम तीर्थ है। यहाँ शम्भुतीर्थ के शिवलिङ्ग का जो स्पर्श करता है, वह गोहत्या से मुक्त हो जाता है। राजन्! जम्बूमार्ग में स्थित उस महातीर्थ में स्नान कर ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
व्याघ्र से सवत्सा गौ के भयभीत होने पर मुनिगणों ने क्रुद्ध होकर ब्रह्मा से प्राप्त भयङ्कर नाद करने वाले घण्टे का वादन प्रारम्भ किया। उस घण्टनाद से व्याघ्र भी सवत्सा गौ को छोड़कर चला गया। ब्राह्मणों ने उसका नाम ढुण्ढागिरि रखा है। हे पार्थ! उसका दर्शन करने वाले मनुष्य निःसन्देह स्वयं रुद्र स्वरूप ही हो जाते हैं।
कुछ क्षणों के उपरान्त भगवान शिव व्याघ्र रूप को त्यागकर साक्षात् वहाँ प्रकट हो गये। वे वृषभ पर आरूढ़ थे, भगवती उमा उनके वाम भाग में विराजमान थीं तथा विनायक, कार्तिकेय के सहित नन्दी, महाकाल, शृङ्गी, वीरभद्रा, चामुण्डा, घण्टाकर्णा आदि से परिवृत थे। मातृका, भूतगण, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, देव, दानव, गन्धर्व, मुनि, विद्याधर, नाग तथा उनकी पत्नियाँ भगवान शिव की आराधना कर रहे थे। सनकादि भी उनका पूजन कर रहे थे।
हे राजन्! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष (मतान्तर से कृष्ण पक्ष) की द्वादशी तिथि में ब्रह्मवादी ऋषियों ने सवत्सा गोरूपधारिणी देवी उमा की नन्दिनी नाम से भक्तिपूर्वक पूजा-अर्चना की थी। इसीलिये इस दिन गोवत्स द्वादशी व्रत किया जाता है। उसी समय से यह व्रत भूतल पर प्रचलित हुआ। राजा उत्तानपाद ने जिस प्रकार इस व्रत को पृथ्वीलोक में प्रचारित किया, अब आप उसका श्रवण करें -
पूर्वकाल में उत्तानपाद नामक एक क्षत्रिय राजा थे। राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, जिनका नाम सुरुचि एवं शुघ्नी या सुनीति था। सुनीति के गर्भ से ध्रुव नामक पुत्र का जन्म हुआ। सुनीति ने अपने उस पुत्र को सुरुचि को सौंपते हुये कहा - 'हे सखि! तुम इस पुत्र की रक्षा करो। मैं सदैव स्वयं सेवा में तत्पर रहूँगी।'
इस प्रकार सुरुचि सदा गृहकार्य सम्भालती थी तथा पतिव्रता सुनीति पति की सेवा में तत्पर रहती थी। सपत्नी द्वेष के कारण एक समय क्रोध एवं मात्सर्य के वशीभूत होकर सुरुचि ने सुनीति के शिशु की हत्या कर दी, किन्तु दैवयोग से वह तत्क्षण ही जीवित होकर खिलखिलाता हुआ अपनी माँ की गोद में बैठ गया। इसी प्रकार सुरुचि ने उस बालक की हत्या करने के अनेक प्रयास किये, किन्तु वह बालक बारम्बार जीवित हो उठता था।
उस बालक को जीवित देखकर आश्चर्यचकित हो सुरुचि ने सुनीति से पूछा - 'हे देवि! यह कैसी विचित्र घटना है तथा यह किस व्रत का फल है, तुमने किस प्रकार का हवन अथवा व्रत का अनुष्ठान किया है? जिसके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र बारम्बार जीवित हो उठता है। क्या तुमने मृतसञ्जीवनी विद्या सिद्ध की है? रत्न, महारत्न अथवा कौन-सी विशिष्ट विद्या तुम्हें ज्ञात है, जिससे यह चमत्कार हो रहा है, यह सत्य-सत्य वर्णन करो।'
सुनीति ने कहा - 'हे बहन! मैंने कार्तिक मास में द्वादशी के दिन गोवत्स व्रत का पालन किया है, उसी के पुण्य प्रभाव से मेरा पुत्र पुनः-पुनः जीवित हो जाता है। जब-जब मैं उसका स्मरण करती हूँ, वह मेरे सम्मुख ही आ जाता हे। प्रवास में रहने पर भी इस व्रत के प्रभाव से पुत्र प्राप्त हो जाता है। हे सुरुचि! इस गोवत्स द्वादशी व्रत का पालन करने से तुम्हें भी सर्वस्व प्राप्त हो जायेगा तथा तुम्हारा कल्याण होगा।'
सुनीति के सुझाव पर सुरुचि ने भी इस उत्तम व्रत का पालन किया। इस व्रत के फलस्वरूप सुरुचि को भी पुत्र, धन तथा सुख की प्राप्ति हुयी। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सुरुचि को उसके पति उत्तानपाद के साथ प्रतिष्ठित कर दिया तथा वर्तमान में भी वह आनन्दित हो रही है। दस नक्षत्रों से युक्त ध्रुव आज भी आकाश में दृष्टिगोचर होते हैं। ध्रुव नक्षत्र का दर्शन करने से सभी पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।"
युधिष्ठिर ने कहा - "हे भगवन्! इस व्रत की विधि का वर्णन करने की भी कृपा करें।"
भगवान् श्रीकृष्ण बोले - "हे कुरुश्रेष्ठ! कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को सङ्कल्पपूर्वक किसी जलाशय में स्नान कर मनुष्य को एक समय ही भोजन करना चाहिये। अनन्तर मध्याह्न के समय वत्स सहित गौ की गन्ध, पुष्प, अक्षत, कुंकुम, अलक्तक, दीप, पुष्पमालाओं तथा उड़द के बड़े सहित निम्नोक्त मन्त्र से पूजा करें -
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट नमो नमः स्वाहा॥
पूजनोपरान्त गौ को ग्रास प्रदान करें तथा निम्नोक्त मन्त्र से गौ का स्पर्श करते हुये प्रार्थना एवं क्षमा-याचना करें -
ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दिनि।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
इस प्रकार गौ की पूजा करने के पश्चात् जल से उसका पर्युक्षण करके भक्तिपूर्वक गौ को प्रणाम करें। इस दिन तवे पर पकाया हुआ भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिये तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये भूमि पर शयन करना चाहिये। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने वाला व्रती, इस व्रत के पुण्य प्रभाव से जीवन पर्यन्त समस्त सुखों का आनन्द भोगता है तथा अन्त समय में गौ के जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक गोलोक में वास करता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये।"
॥इस प्रकार भविष्यपुराण के उत्तरपर्व में वर्णित गोवत्स द्वादशी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥